हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से
क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से
जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो
क्या मिलेगा किसी को इबादतों से
राजेश’अरमान’
हासिल कुछ भी
Comments
6 responses to “हासिल कुछ भी”
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behatreen lines
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thanx
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nice bro!
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thanx
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Good
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Nice one
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