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    1. आदरणीय विजयजी; कृषि के लाभ का सौदा न रहने और हस्तकौशल का मशीनीकरण की बलि चढ़ जाने से ; रोजगार की तलाश में गाँवों का जो पलायन शहरों की ओर हो रहा है——उसी टीस का बयान है—-यह रचना।प्रयास रहा है कि; अर्थोपार्जन हेतु मर्म को कितनी चोट पहुंचती है।कुछ व्यवस्थाओं की विसंगतियां—-कुछ विकास की विद्रुपता —-कुछ जीवन यापन की मज़बूरियां और अंतत: इन सबका खा़मियाजा भुगगता बचपन और उपेक्षित यौवन।दर्द की जु़बां होती तो वो अलहदा और क्या कहता ? आभार आपके प्रोत्साहन हेतु।

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