ज़िन्दगी ना थी – 2

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी

दीवारें थी कच्ची कमजोर हमारी, ना जैसी तुम्हारी

Comments

2 responses to “ज़िन्दगी ना थी – 2”

  1. Pratima chaudhary

    बहुत ही उम्दा

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