ज़िन्दगी ने मुझको जीना सिखा दिया
अकेले होकर भी खुश रहना सिखा दिया
रहती है यादें अब खुशियों के दरम्या
यादों ने आसूंओ से दामन छूड़ा लिया
Tag: ज़िन्दगी पर कविता
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ज़िन्दगी ने मुझको जीना सिखा दिया
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ज़िद्दी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है
कभी मेरी सुनती नहीं बस अपनी ही सुनाती है…
कभी जो पूछू सवाल उस से,माँगा करू जवाब
उस से
बस वो धीरे से मुस्कुराती है
ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है…
कई बार बतलाई अपनी ख्वाहिशे उसको ,
इल्तजा भी की कोई जो पूरी कर दो
वो मेरी अर्ज़ियाँ मुझको ही वापस भिजवाती है
ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है …
मुझसे कहती है आज न सही, कल
पूरी कर दूंगी ख्वाहिशे तेरी,तू हौसला न छोड़
बस इसी कल की आरज़ू में, मुझे दो कदम
और अपनी ओर ले जाती है….
ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है
कभी मेरी सुनती नहीं बस अपनी ही सुनाती है ……
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मुश्किल ए ज़िन्दगी
मैंने ज्यादा किताब पढ़ा नही
पर मुश्किल ए ज़िन्दगी ने बहुत कुछ सीखा दिया -
ज़िन्दगी कोरा कागज़ थी हमारी
ज़िन्दगी कोरा कागज़ थी हमारी
तुमने कुछ रंग भर दिए
आये हो तोह रुक जाओ
इतनी जल्दी क्या जाने कीपर रोक तोह हम सकते नही
वरना रब बुरा मान जाएगा
उसे भी तोह अच्छे लोगों की जरूरत हैएक मैं ही महिरूह सा रह गया
रंगों के बौछार के बावजूद
एक मैं ही बेरंग सा रह गया -
ज़िन्दगी
इतनी भी नाराज़गी ठीक नहीं
की फासले उम्र भर का हो जाये
पल भर का जीना है यारों
बेगाने लोगों को छोड़ यहाँ अपनो से फुरसत नहीं। -
ये ज़िन्दगी कैसी
परत दर परत यूँही खुलती सी नज़र आती है ज़िन्दगी,
उधेड़ती तो किसी को सिलती नज़र आती है ज़िन्दगी,हालात बदलते ही नहीं ऐसा दौर भी आ जाता है कभी,
के जिस्म को काट भूख मिटाती नज़र आती है ज़िन्दगी,दर्द जितना भी हो सहना खुद ही को तो पड़ता है जब,
चन्द सिक्कों की ख़ातिर बिकती नज़र आती है ज़िन्दगी।।बदलती है करवटें दिन से लेकर रात के अँधेरे में इतनी,
सच में कितने किरदार निभाती नज़र आती है ज़िन्दगी।।राही अंजाना
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ज़िन्दगी
पहली बार जब रोया तोह भूख और प्यास थी
दूसरी बार जब रोया स्कूल का पहला दिन था
तिसरी बार जब रोया तब स्कूल का आखरी दिन थाकॉलेज के दिन तोह रुलाने के थे दुसरो को
छोड़ो ना उस बात कोऔर मुझको लगता था सबसे ज्यादा गम तेरे छोड़ने का था
पढ़ जब सोचने और लिखने बैठा तोह देखा
यह एक मामूली घटना हैं जो तकरिबन सबके साथ हुआ हैं
हम ज़िन्दगी में भूल जाते हैं की तवज्जो किस बात को देना हैदोस्तों यह चंद लाइन बेहद निजी है
पढ़ सोचा यह बहुतों को जीने का ढंग बतलाता है
जो कहते है कि एक बार जो चीज़ गवाओ वो दूसरी बार नहीं मिलती गलत कहते है
ज़िन्दगी सतरंज की बिसात होती हैं
कुछ मोहरे पिटते और कुछ हमे जीता देते हैं
कुछ बाजियां हम हार कर भी जीतते है -
ज़िन्दगी
ये जिंदगी थोडा अपनी रफ़्तार को धीमा तो कर
हम जब तक कुछ समझे तू और आगे निकल जाती है।। -

स्वप्न तेरे साथ ज़िन्दगी का देखकर
स्वप्न तेरे साथ ज़िन्दगी का देखकर,
सदियाँ बीत गई ‘राही’ की सोते सोते।।
राही (अंजाना) -

ज़िन्दगी एक रेस है जिसमे दौड़ना ही होगा
ज़िन्दगी एक रेस है जिसमे दौड़ना ही होगा,
वक्त रहते वक्त का मुँह मोड़ना ही होगा,
कालचक्र का काम है चलना, चलेगा दोस्तों,
हमें अपने मन को एक बार फिर टटोलना ही होगा,
ऋतुएँ परिवर्तित हों इससे पहले ही सुन लो,
हवाओं के रुख से तुम्हें फिर बोलना ही होगा।।
राही (अंजाना)
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पिघलती रही,बदलती रही जिन्दगी
कभी आइस– क्रीम की तरह पिघलती रही जिन्दगी,
हवा की रूख की तरफ बदलती रही जिन्दगी,
लाख समझया उसे पाने की जिद ना करो–
पर इक वच्चे की तरह जिद ठानी रही जिन्दगी।
मंजिल पर कैसे पहुच पाते
सीढ़ी ही थी फिसलन वाली,
कोशिश तो बहुत की लेकिन फिसलती रही जिन्दगी,
मैने तो अब हार चुका हूँ जिन्दगी से,
क्योकि वो मंजिल ही थी जिन्दगी।।ज्योति
मो न० 9123155481 -

पिघलती रही,बदलती रही जिन्दगी
कभी आइस– क्रीम की तरह पिघलती रही जिन्दगी,
हवा की रूख की तरफ बदलती रही जिन्दगी,
लाख समझया उसे पाने की जिद ना करो–
पर इक वच्चे की तरह जिद ठानी रही जिन्दगी।
मंजिल पर कैसे पहुच पाते
सीढ़ी ही थी फिसलन वाली,
कोशिश तो बहुत की लेकिन फिसलती रही जिन्दगी,
मैने तो अब हार चुका हूँ जिन्दगी से,
क्योकि वो मंजिल ही थी जिन्दगी।।ज्योति
मो न० 9123155481 -
अरे, ओ जिन्दगी से निऱाश आदमी सुनो।
अरे ,ओ जिन्दगी से निऱाश आदमी सुनो—
सड़क पर भटकते हो क़्यो सुनो।
कुछ तो कर्म करो—–
अपने स्थिति को देखो कुछ तो शर्म करो।।
कब –तक कोसते रहोगे,अपने भाग्य को, अंधकार से निकलने का कुछ तो कर्म को करो ।
अपने आप को समझों कुछ तो प्रयत्न करो,
अपने आप को समझो,उठाओ कदम मत रूकना जब तक ना मिले सफलता।
देखना मिट्टी भी हो जाएगी सोना !!! -

ज़िन्दगी जैसे शतरंज की बिसात हो गई
ज़िन्दगी जैसे शतरंज की बिसात हो गई,
जिसने समझ ली उसकी जीत ना समझा जो उसकी मात हो गई,ज़िन्दगी जैसे……
बंट गए हैं चौंसठ खानों में हम कुछ इस तरह,
जैसे खाने से हटते ही मोहरे की काट हो गई,
ज़िन्दगी जैसे….तलाशते हैं खामियां अब लोग कुछ इस तरह,
जैसे किले से निकली और रानी कुरबान हो गई,ज़िन्दगी जैसे….
राही (अंजाना) -
माना के ज़हरीली ज़िन्दगी है
माना के ज़हरीली ज़िन्दगी है मगर जिगर पाक रखते हैं,
हम इन्सा नहीं जो दिल में कोई बात रखते हैं,
यूँ तो गले लगाने की फितरत नहीं हमारी,
मगर इरादे जो भी हो हम साफ़ साफ़ रखते हैं॥
राही (अंजाना)
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ज़िन्दगी
यूँ तो हल्की सी है ज़िन्दगी,
वजन तो बस ख्वाइशों का है।।
राही (अंजाना) -
नयन अश्कों से भिगोता रहा हूं मैं जिन्दगी भर
नयन अश्कों से भिगोता रहा हूं मैं जिन्दगी भर ।
गजल उनको ही सुनाता रहा हूं मैं जिन्दगी भर ।दरख्ते उम्मीद अब है कहां लगतें तेरे जमी पर
रकीबों सा अब तड़पता रहा हूं मैं जिन्दगी भर।दुआओं का रुख बदलता रहा ताउम्र,गिरगिटों सा,
मुबारक फिर भी से करता रहा हूँ मैं जिन्दगी भर।फ़िकर अब किसको रहा है जमाने में देख दिलवर,
दरद अपनी अब भुलाता रहा हूं मैं जिन्दगी भर।मुकद्दर भी कब सही था हमारा इस दौर “योगी”
मगर रों रों कर हसाता रहा हूँ मेै जिन्दगी भर।योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा,छत्तीसगढ़
7000571125 -
ज़िन्दगी की किताब
अभी ज़िन्दगी की किताब के चन्द पन्नों को पटल कर देखा है।
अपने बचपन को जैसे सरसरी निगाहों से गुजरते देखा है,
यूँ तो खुशियों के पायदान के पृष्ठ पर आज पैर हैं हमारे,
मगर हमने भी दुखों के हाशियों पर खड़े रहकर देखा है॥
राही (अंजाना) -

नोच खाने को बैठी है एक ज़िन्दगी
एक नज़र चाह कर भी मिलाने को तैयार नहीं,
ज़िन्दगी एक पल भी सर उठाने को तैयार नहीं,नोच खाने को बैठी है एक ज़िन्दगी ज़िन्दगी को कैसे,
क्यों एक लम्हा भी कोई ठहर जाने को तैयार नहीं।
राही (अंजाना) -

ज़िन्दगी की किताब
अभी ज़िन्दगी की किताब के चन्द पन्नों को पटल कर देखा है।
अपने बचपन को जैसे सरसरी निगाहों से गुजरते देखा है,
यूँ तो खुशियों के पायदान के पृष्ठ पर आज पैर हैं हमारे,
मगर हमने भी दुखों के हाशियों पर खड़े रहकर देखा है॥
– राही (अंजाना) -
जिन्दगी के तजुर्बे
“**जिन्दगी के तजुर्बे”**
************जिंदगी के तजुर्बे
सताते
बहुत हैं ,हँसाते बहुत हैं ,
रुलाते
बहुत हैं ।कभी हों अकेले ,
हाँ
बिल्कुल अकेले,तजुर्बे
साथ मन से
निभाते बहुत हैं ।*********^^^^^^^^************
*** जानकी प्रसाद विवश**** -

ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी “रहस्य “देवरिया
Happy mother day मेरे तरफ से एक छोटी सी कोशिश उम्मीद करता हूँ सबको पसंद आएगा
€€€€€€€€€€€€€
ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी देने की वजहा बता देता,
ऐसा क्या किये थे तू मुझे मेरी खता बता देता,,
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अपने भूख प्यास को भूला के तूझे पालते रहे,
अगर हैं ये खता तो मुझे मेरी सजा बता देता,,
**********
जरूरत पडीं तो आज भी जान निसार करदू तूझपे,
तूझे काबिल बनाने मे कमी रही हो तो वो कमी बता देता,,
**********
आज कमजोर पडती हाथों से साथ छोड़ा लिया तूने,
कहाँ जाएंगे अब इस उम्र मे बेटा वो जगहा बता देता,,
**********
ऐसी बेबसी भरी जिन्दगी देने की वजहा बता देता,
**********
****(“रहस्य “)देवरिया **** -
ज़िन्दगी
इस तरह उलझी रही है जिन्दगी,,,,,,
कोन कहता है सही है जिन्दगी।।।।।
उलझनो का हाल मै किससे कहु,,,
आँख के रस्ते बही है जिन्दगी।।।।
अब नही पढना नशीब में इसे,,,
गर्द सी मुझपे जमी है जिन्दगी।।।
ना सुकूँ है दिल बडा बेचैन है,,,
आग के जैसे जली है जिन्दगी।।।।
उलझनो में ही सदा उलझा रहा,,,,
मकङियो के जाल सी है जिन्दगी।।।
ख्वाब है ना आखँ में नींदे कहीं,,,,,
खार सी चुभने लगी है जिन्दगी।।।
फुरसतो के पल नही मिलते मुझे,,,
काम में ऐसी दबी है जिन्दगी।।।।
मन्जिलो का भी निशाँ मिलता नही,,,,
कोन से रस्ते चली है जिन्दगी।।।।। -
जिन्दगी
“ऐ दिल” तुझसे फुर्सत मिले
जिन्दगी को तभी तो समझूँगा मैं।
पारुल शर्मा
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हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा…..
तन्हाई खुद-बा-खुद बन गयी हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा
चलो कोई ये तो नहीं कहेगा अब, ये तन्हा है दुनिया में………………..!!D K
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ज़िन्दगी
………………….…Few lines on life …………………..……
Kabhi gam to kabhi khushiyon ki saugat hai zindagi.
Kabhi dhoop to kabhi chhaon mein tahalatee ek aash hai zindagi . . …..Kudrat ka diya ek anmol sa uphaar hai zindagi.
Meennato ke bad mila kudrat ka pyar hai zindagi…………….Har roj naye-naye sabak sikhati ek raj hai zindagi.
Vastavikta ka ehsaas karane vali ek aadhar hai zindagi…..Samajh na paya jise koi vo paheli hai zindagi.
Tanhaiyon mein saath de jo vo saheli hai zindagi….Karmo ke aadhar pe milti hai yeh zindagi.
Sapno ke bheed me akele chalti hai zindagi……Samay ke sath badlne vali ek tehzeeb hai zindagi.
Khatti – meethi yaado se bani ek lakir hai zindagi…..….Kuch bhi na jaan kar sab kuch jaan le vo mehman hai zindagi.
Ulajhe rishton ki bani ek misal hai zindagi……….Neer ki tarah bahane wali ek pyaas hai zindagi.
Har pal jo jale wo misaal hai zindagi……….Mushkilo mein bhi umeed ke sahare guzrti hain zindagi.
Gum me bhi kisi na kisi ke sahare aage chalti hain zindagi…………..Kabhi ugta hua suraj to kabhi andheri shaam hai zindagi.
Kudrat ka diya aur maa se mila uphaar hai zindagi……….Yoon hee na bitao ye anmol aur bahut khaas hai zindagi.
Kuch alag kar ke dikhao ye bemisaal hai zindagi………….Duniya ki is bhid me na kho jaaye ye zindagi.
Dekh ke muskuraye tumhe kuch is tarah banao zindagi……
……………………………………………………कभी ग़म तो कभी ख़ुशियों की सौगात है ज़िन्दगी!
कभी धूप तो कभी छाँव में टहलती एक आश है ज़िन्दगी!!!कुदरत का दिया एक अनमोल सा उपहार है ज़िन्दगी!
मिन्नतों के बाद मिला कुदरत का प्यार है ज़िन्दगी!!हर रोज नए-नए सबक सिखाती एक राज है ज़िन्दगी!
वास्तविकता का एहसास कराने वाली एक आधार है ज़िन्दगी!!समझ न पाये जिसे कोई वो पहेली है ज़िन्दगी!
तन्हाइयो में जो साथ दे वो सहेली है ज़िन्दगी!!कर्मो के आधार पे मिलती है ये ज़िन्दगी!
सपनों की भीड़ में अकेले चलती है ज़िन्दगी!!समय के साथ बदलने वाली एक तहज़ीब है ज़िन्दगी!
खटी मीठी यादो से बनी एक लकीर है ज़िन्दगी!!कुछ भी न जान के सबकुछ जान ले वो मेहमान है ज़िन्दगी!
उलझे रिश्तों की बनी एक मिसाल है ज़िन्दगी!!नीर की तरह बहने वाली एक प्यास है ज़िन्दगी!
हर पल जलने वाली एक मिसाल है ज़िन्दगी!!मुश्किलों में भी उम्मीद के सहारे गुजरती है ज़िन्दगी!
गम में भी किसी ना किसी के सहारे आगे चलती है ज़िन्दगी!!कभी उगता हुआ सूरज तो कभी अँधेरी शाम है ज़िन्दगी!
कुदरत का बनाया और माँ का दिया उपहार है ज़िन्दगी!!यूँ ही न बिताओ ये अनमोल और बहुत खास है ज़िन्दगी!
कुछ अलग कर के दिखाओं ये बेमिसाल है ज़िन्दगी!!दुनिया की इस भीड़ में न खो जाये ये ज़िन्दगी!
देख के मुस्कारय तुम्हे कुछ इस तरह बनाओ ज़िन्दगी!!|||||||||||||||||||||।By – Vikas Amber Pandey||||||||||||||||||
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कचरे में छिपी ज़िन्दगी की चाबियाँ
बन्द कर अपने जज़्बातों के सभी दरवाजों को,
लगाये लब्जों पर हम खांमोशी के बड़े तालों को।
देखो किस तरह ढूंढने में लगे हैं हम कचरे में छिपी अपनी जिंदगी की चाबियों को॥
यूँ तो तमाम रिश्तों के धागों में बंधे हुए हैं हम भी मगर,
नज़र आते हैं दो रोटी की खातिर खोजते हम न जाने कितने ही कचरे के ढेर मकानों को॥
जहाँ तलक भी नजर जाती है फैली गन्दगी ही नज़र आती है,
फिर भी ढूढ़ते हैं कूड़ा कवाड़ा हम रखकर सब्र अपने जिस्म ऐ ज़ुबानों को॥
राही (अंजाना)
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कुछ लोग यूँ भी ज़िन्दगी बसर कर रहे है……..
कुछ लोग यूँ भी ज़िन्दगी बसर कर रहे है
बीन कर कचड़ा सब्र कर रहे हैज़िन्दगी सिर्फ अमीरों की नहीं है
ये तो तोहफा है खुदा का, ये गरीबों की भी हैक्यों करते हो नफरत तुम इन सब को देख कर
ये हम जैसों की ज़िन्दगी को सरल कर रहे हैजब आते है गली मे, कुत्ते भोंकते है इन पर
सब देखते है इनको शक की नज़र सेकभी झाँक कर देखो इन सब के घर और आंगन मे
ये अपनी ज़िन्दगी का क्या हस्र कर रहे हैअक्सर हम फैंक देते है कचरे को यूँ ही
ये सब उन्ही कचरों मे रोटी ढूंढते हैये भी काम रहे है अपनी आजीविका
ये भी हमारी तरह इधर से उधर कर रहे हैज़िन्दगी इनकी भी बड़ी आम सी दिखती है
बस ज़रा बदनाम सी दिखती हैहम सब भी करते है काम अपना अपना
वो सब भी इसी तरह अपना अपना कर्म कर रहे हैकड़ी मेहनत से जूझना पड़ता है उन सब को भी
थकान शरीर की होती है उन सब को भीहम सब उठाते नहीं कचड़ा शर्म के मारे ये सच है
मगर ये सब ये काम बेधड़क कर रहे हैशिकार होते है ये बस हमारे बनाये हुए समाजो के
मिलती है गालियां, डांट और गुस्साकचड़ा अगर ये न उठाये तो गंदगी बहुत बढ़ जाये हर जगह पैर
ये सब ऐसा कर के, बहुत बड़ा धर्म कर रहे हैकुछ लोग यूँ भी ज़िन्दगी बसर कर रहे है
बीन कर कचड़ा सब्र कर रहे है …………………………………..!!!……….D K……….!
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रोटी तलाशती ज़िन्दगी।
तलाशती ये ज़िंदगी कचरे के ढेर में रोटी.
फेक देते हैं हम जो अनुपयोगी समझ के.कैसे करते गुजर बसर ये भी इंसान तो हैं
जिंदगी ये पाकर मौत गले लगाये चल रहे.ज़हर भरे स्थानों में इन्हे अमृत की खोज है.
ये जगह दो जून की रोटी देती ही रोज है.कुछ कपडे ही मिल जायें फटे तन ढकने को.
यही हैं ताकती निगाहें थोड़ा सा हँसने को.लेकर वही फटी मैली बोरी चल दिये रोज.
मन में विश्वास लिये आज मिलेगा कुछ और.भूखा है पेट इनका और चेहरे पर मुस्कान.
ढेर कचरे का बन गया अब इनकी पहचान.कट रही है जिंदगी ऐसे ही गंदगी ढोते हुये.
भविष्य नही इनसे क्या मेरे भारत का महान ?रश्मि….
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ज़िन्दगी अपनी……
ताश के पत्तों की तरह हो गई है ज़िन्दगी अपनी,
जो भी आता है बस खेल कर चला जाता है………………!!………………D K
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पूरी ज़िन्दगी……..
इतना भी आसान नहीं,
किसी को इश्क़ मे पा लेनापूरी ज़िन्दगी दाव पर लगनी पड़ती है,
हर तरह से किसी का होना पड़ता है…………..!!…………D K
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गुमनाम-ऐ-ज़िन्दगी
सब कुछ तो छोड़ आया मैं अपना अतीत के पन्नों में
सख्शियत मेरी अब इंसान -ऐ -आम रह गई हैखुशियों की सुबह न जाने कब से नहीं देखी
बस ज़िन्दगी में गमो की शाम रह गई हैबेच कर खुद को हमने खरीदी थी मोहोब्बत किसी की
अब हर खुवाईशैं नीलाम रह गई हैहोता नहीं यकीं अब हमको इस इश्क़ पैर
हाथों में चाहत -ऐ -जाम रह गई हैखुसी लौट नहीं सकती फिर से ज़िन्दगी में हमारी
हमारी हर दिल -ऐ -आरज़ू बदनाम रह गई हैउधेड़ -बून और ख़ोज-बीन का सिलसिला शायद अब चलता रहेगा
ज़िन्दगी अब शायद गुमनाम रह गई है …………!! -
मौत ने तोहफा दिया ज़िन्दगी
मौत ने तोहफा दिया ज़िन्दगी
मिल जाए तो सवरती बिखरती
कट जाती है रो रो कर
गुजरती लम्हे सी
हस्ती दिल खोल
बोलती सोच कर
ये मौत ही देती है ज़िन्दगीदेती तोहफे हज़ार इक बार
न जाने कभी हक़ीक़त जीए
ख्वाब बन,या जीया इक
अफसाना,फ़साने की राह पर
तुम मरे ,मरे पल पल
जीते रहे मर मर कर
तोहफे में तोहफा मरने का दिया जिंदगीजब वक़्त की रेत जिस्म को खोखली कर
रूह को आज़ाद कर रही
तब मौत ने अपनाया
तोहफे से न ललचाया
न उलझा फिर ज्ञान आया
माया मोह बंधन छोड़ आया
अब जीने लगा आशीष जैसे जिंदगी
मौत ने तोहफा दिया जिंदगीRegards,
Ashish sharma
Kota(raj.) -
ज़िन्दगी से क्या कहे आसान हो जाओ।
ज़िन्दगी से क्या कहे आसान हो जाओ।
खामियां खुद में है साहिल क़बूल करते है।।
@@@@RK@@@@ -
ज़िन्दगी जीने की वजह कोई।
ढूंढ रहे है जिंदगी जीने की वजह कोई।
तुम्हारी यादें न हो है ऐसी जगह कोई।।
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हक़ीक़त बयान करना अगर जुर्म है गर।
फिर बोल दो हमारे लिए भी सजा कोई।।
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दर ब दर घुमे है न जानें किस जुस्तजू में।
जबकि न कोई मंजिल है न है पता कोई।।
,
इक जख़्म हरा होता रहा यादों के सहारे।
जिसके लिये न मरहम है,न है दवा कोई।।
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सूख गई अरमानो की फ़सल बिना बारिश के।
कब समझा आखिर मौसमो की अदा कोई।।
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सूखे पत्तो की तरह बिछे थे ख्वाब राहों में।
कही है नई महफ़िले तो कही है जुदा कोई।।
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सबब एक नहीं थे साहिल मेरी मौत के लिए।
वैसे भी मौत से कहाँ आज तक बचा कोई।।
@@@@RK@@@@ -
जिन्दगी भर भटका किये राह-ए-उम्मीद में,
जिन्दगी भर भटका किये राह-ए-उम्मीद में,
कभी पहुँच ही ना पाये दयार-ए-हबीब में,शाम ढ़ल गयी और हम यूँ ही बैठे रह गये,
वो आये और जा बस गये निगह-ए-अंदलीब में,क्या खता खुदा की क्या उनकी खता थी,
जब लिख दिये हो किसी ने ग़म-नसीब में,जब वो अक्स-ए-रूख थे देख रहे मेरे रकीब में,
हम पूँछते ही रह गये क्या कमीं थी मुझ गरीब में,वो आके हमसे पूछते क्या हो किसी तकलीफ में,
हम घुट घुट के यूँ ही मर गये हिज्र-ए-हबीब में, -
ज़िन्दगी का खेल
तेरा डूबना मुश्किल था “राही” मगर,
क्या करते जब दूर तक साहिल नहीं था,
कहाँ कब किससे गुफ्तगू करते “राही”,
जब दूर तलक कोई सफर में मुसाफिर नहीं था,
सबसे ज्यादा उसके करीब था “राही” मगर,
शायद वो तुमसे मुखातिब नहीं था,
ज़माने से अनजान थी “राही” तेरी राहें मगर,तू लोगों की नज़र में अंजाना नहीं था,
वो जो टूट गया “राही” आइना था मगर,
सच ये है के वो कोई दिल नहीं था,हम उस ज़िन्दगी की शतरंज की बिसात हैं “राही”,
जहाँ खेल तो था मगर कोई पक्का नियम नहीं था॥
राही (अंजाना)
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तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले
तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक
अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं
तुम्हें पा के हम ख़ुद से दूर हो गए थे
तुम्हें छोड़कर अपने पास आ गए हैं
तुम्हें ज़िन्दगी के…तुम्हारी वफ़ा से शिक़ायत नहीं है
निभाना तो कोई रवायत नहीं है
जहाँ तक क़दम आ सके आ गए हैं
अंधेरे हमें आज…
तुम्हें ज़िन्दगी के…चमन से चले हैं ये इल्ज़ाम लेकर
बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर
मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए हैं
अंधेरे हमें आज…
तुम्हें ज़िन्दगी के…– गुलज़ार
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कैसी ये ज़िन्दगी
हर एक कश के साथ धुंए में अपनी ज़िन्दगी उड़ाते हैं,
देखो आजकल के मनचले कैसे अपने कदम भटकाते हैं,पाते हैं कितने ही संस्कार अपने घरों से मगर,
हर सिगरट के साथ वो रोज उनका अंतिम संस्कार कर आते हैं,
जिस दिन हो जाती हैं खत्म उनकी ज़िन्दगी की साँसे,
वही सिगरट की राख वो अपनी चिता में पाते हैं॥
राही (अंजाना)
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‘ना जाने क्यों उन्होंनें जिन्दगी ही नाम कर दी
मैं उनसे चन्द पल की ही तो मोहलत माँगता था,
ना जानें क्यों उन्होंनें जिन्दगी ही नाम कर दी हैं,मैं सोया हूँ नहीं दिन रात जबसे देखा हैं उनको,
निगाह-ए-इल्तिफातों में सुबह से शाम कर दी हैं,उसी कूचे में रहता हूँ जिधर से तुम कभी गुजरीं,
हिकायतें इस कदर फैली मुझे बदनाम कर दी हैं,बज्म़ यारों की कभी लगती थी जहाँ कल तक,
आज उस चौखट को मयखाने के नाम कर दी हैं,पैरहन तक हैं तेरे ही नाम के अब तो,
जियाद़ा कुछ नहीं बदला बात ये आम कर दी हैं,कभी शायर नहीं था मैं कभी नज्में नहीं लिखी,
दर्द दिल में ज़रा उठा आवाज-ए-अवाम कर दी हैं, -

जिन्दगी का फलसफा
जिन्दगी का फलसफा कौन समझ पाता है
हालात बदलते है नहीं वक्त गुजर जाता है
कल ये हुआ,कल क्या होगा इस कशमकश में, पल पल पिस जाता है
कल बदलता है नहीं आज बिगड़ जाता हैा
** ” पारुल शर्मा ” ** -
जिन्दगी
एक ताज़ा ग़ज़ल के चन्द अश’आर आप हज़रात की ख़िदमत में पेश करता हूँ; गौर कीजिएगा…
चाहता था जिसे जिन्दगी की तरह,
वो रहा बेवफ़ा जिन्दगी की तरह।हाँ मेरा प्यार था बस उसी के लिए,
जिसने लूटा मुझे था सभी की तरह।दूर जाके मुझे आजमाता रहा,
जो ज़ेहन में बसा सादगी की तरह।पास आया न मेरे कभी वो देखो,
मुझमें शामिल रहा तिश्नगी की तरह।कैसे बीते सफ़र अब ये काफ़िर भला,
रूह में उतरे वो शायरी की तरह।#काफ़िर (10/07/2016)
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जिन्दगी और कविता
जब होश संभाला तो
तुमसे जिंदगी को समझाया जाता था
अब कुछ भी समझता हूँ
तो तुम्हारा सृजन होता है
जब मस्तिष्क का ताल
दिल के तारों को छेड़ता है
तो झंकृत हो तुम बाहर आती हो
तुम तब भी होती हो
जब रात चोरी-छिपे
दिन से मिलकर भाग रही होती है
और तब भी,
जब नदी किनारे
आसमान वसुंधरा की गोद में
अपना सर रख अपने प्यार का इजहार कर रहा होता है
तुम जीवन की हरेक खुशहाली में
शहद की तरह घुली तो हो ही
जीवन के नीम अँधेरे में भी
तुम ज्योतिर्मय हो
‘कविता’ तुम बसी हो
जीवन के हरेक क्षण में,हर कण में
क्योंकि तुम भी तो एक जिंदगी हो…..For more stories and poetries
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बहुत अमीर है जिन्दगी
बहुत अमीर है जिन्दगी,
लफ़्जो को सलीके से,
बिठाने में वक्त बिताया करती,
गर्मी में सर्दी, सर्दी में गर्मी,
यूँ विपरीत परिस्थतियों को,
मात देते हुए खेल आगे बढ़ाया करती,
बहुत अमीर है जिन्दगी,
न कोई गिला न शिकवा ,
लम्हों पर अपनी हूकूमत जताया करती,
फरमाईशो से जुदा,
वो तो फरमाईशो को निभाया करती,
बहुत अमीर है जिन्दगी,
चाँदनी रात में हो नौका विहार,
कहकशो से हो दिल की बात,
ऐसे विचारों से मन को बहलाया करती,
जब भी गुलशन में जाती,
पतझड़ हो या बहार,
सबसे यूँ हीं दिल लगाया करती,
बहुत अमीर है जिन्दगी ।। -
जिन्दगी ठहरी रही
**ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी::गज़ल**
(मध्यम बहर पर)
उस ख्वाब की ताबीर जब शम्म-ए-फुगन में जल पड़ी,
तब ज़िन्दगी ठहरी रही और उम्र आगे चल पड़ी l
फ़िर कैफियत का ज़िक्र भी मुझको अजाबी हो गया,
हर कैफियत की बात पर सोज-ए-निहां पिघल पड़ी l
तू जब तलक पहलू में था ख्वाबों के दिल पर तख्त थे,
हिज़रत हुई तुझसे तो यादें सांस-सांस ढल पड़ी l
हर शय को मैंने मात दी दौर-ए-खुमारी के तहत,
फ़िर उम्र ठंडी हो गयी और दास्तां उबल पड़ी l
ऐ जिन्दगी ! तेरी रक़ाबी टूटकर गिरने लगी,
कश्कोल जब हिम्मत की टूटी आके औंधे बल पड़ी l
उम्रभर का ये बशर खामोशियों में था मगर,
जब सीढ़ियां खतम हुईं, इक नज़्म सी मचल पड़ी l
मैं अब भी तेरा ज़िक्र हंसकर टाल देता हूं मगर,
तेरी कहानी क्या छुपे!, जब तक मेरी गज़ल पड़ी ll
word-meanings-
ख्वाब की ताबीर=सपने की सच्चाई
शम्म-ए-फुगन=आंसूओं की आग
कैफियत=समाचार/हाल-चाल
सोज़-ए-निहां=मन में छुपी तकलीफ़
हिज़रत=जुदाई
दौर-ए-खुमारी=जवानी के दिन
रक़ाबी=तश्तरी
कश्कोल=कटोरी
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-Er Anand Sagar Pandey
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ज़िन्दगी खफा है अब मनाऊँ किस तरह
ज़िन्दगी खफा है अब मनाऊँ किस तरह
दिल पे चोट है अब मुस्कुराऊँ किस तरहचोट कोई अंदर है जिससे टिस उठती है
चिर से दिल दर्द अब दिखाऊँ किस तरहआँखों के तलवों निचे,काई जमी रहती है
आँसुओं को आँखों में छिपाऊँ किस तरहन सोता है न चैन से मुझे सोने देता है
दिल को अपने अब बहलाऊँ किस तरहजल जल के हिज्र में दर्द खीरा हो गया
भीतर लगी आग को बुझाऊँ किस तरहदिल तो सीने से “पुरव” निकलता नहीं
दर्द-ए-दिल ग़ज़ल में सुनाऊँ किस तरह -
ज़िन्दगी में तजुर्बों की इक किताब रख
ज़िन्दगी में तजुर्बों की इक किताब रख
चेहरे देख परख और उनका हिसाब रख !!मुझे बे-घर कर दिया नींद के फरिश्तों ने
सूनी आँखों पे पहले तू कोई ख्वाब रख !!खुद ही खुद को लिख रहा हूँ खत कब से
मेरे खतों के कभी तो तू कोई जवाब रख !!भीतर से मैं आज भी बच्चा ही हूँ बहला ले
लाकर हथेली पे मेरी कभी माहताब रख !!मेरे अंदर झाँक कर,अंदर से देख मुझको
कभी काँटों के बिच तू कोई गुलाब रख !!पढ़ लेंगे लोग चेहरे से हाल-ए-दिल सारा
पुरव आँखों में तू आँसुओ का सैलाब रख !!पुरव गोयल
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जान भी तू है ज़िन्दगी तू है
जान भी तू है ज़िन्दगी तू है
जाने जाँ जाने शायरी तू है
खुश्बू-ए-इश्क से धुली तू है
मेरी सांसो मॆं बस गई तू है
रूबरू ख़्वाब मॆं हक़ीक़त मॆं
मेरी रग रग मॆं दौड़ती तू है
किरने बिस्तर पे मेरे पड़ती हैं
जैसे खिड़की से झांकती तू हैशाम के वक़्त छत पे आ जाना
मुझको किस दर्ज़ः चाहती तू है
फूल जैसा हँसी बदन तेरा
उम्र गुज़री मगर वही तू हैतेरा आरिफ है मुतमईन जानाँ
दूर रह कर भी पास ही तू हैआरिफ जाफरी

