10 Comments

    1. आभार अंजलिजी।यही हमारी आम राजनीति का खास चेहरा है।

    1. आभार अजयजी।अपने आसपास का सच बहुत उद्वेलित् करता है।सत्ता की महत्वाकांक्षा किसतरह अपने साधन ढूंढ कर समाज को दूषित करती है—–इसकी बानगी है : यह कविता।

    1. आभार मित्र ! जिस निरंतरता से हमारा सामाजिक और सामासिक ह्वास हुआ है ; उससे दुगृना राजनीतिक और सांस्कृतिक पतन।कविता तो आईना ही होती है।अब चेहरा ही इतना घिनौना है तो कविता भला कहां तक विद्रुपता छुपा पायेगी।हम भी भला इस सच से कहां मुंह छुपा पाते हैं ?

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