जिन बाज़ारों में बड़ी रौनक़ है
कल सन्नाटा उनमे छाएगा
बंद होनी हैं दुकाने सब
ऐसा बाज़ार नहीं रह पाएगा
नफ़रत के अंधेरों में जो सौदेबाज़ी होती है
जिन जिन लोगों की भी उसमे हिस्से दारी होती है
अब ये सौदा न हो पाएगा
और न हिस्सा भी मिल पाएगा
न ऊपर से फ़रिश्ते आएंगे
और न दूर से परिंदे आएंगे
अपने अपने हक़ की खातिर
इस धरती से निकल सब आएंगे
धूप छन छन के अब आएगी
सारे परदे जल जाएंगे
छिपा रहा जो सदियों से
अब वह न छिप पायेगा
जिन बाज़ारों में बड़ी रौनक है
कल सन्नाटा उनमे छाएगा ।
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