मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

तेरी आँखों में रहूँगी तो सँवर जाऊँगी
गर तेरे बदले मिले दुनिया मुकर जाऊँगी

ख्याल हूँ कैद न कर तू मुझे इन पलको में
खुशबू बन तेरा मै दामन छू गुज़र जाऊँगी

छूना मत तल्ख़ हक़ीकत भरे हाथों से
ख्वाब नाज़ुक हूँ मै आँखों का बिखर जाऊँगी

रोकते काश मुझे इक दफा यह हसरत थी
रंज लेकर यही मिट्टी में उतर जाऊँगी

तेरी आँखों से गिरी सूखे से पत्ते जैसी
बह के सैलाब में इस गम के किधर जाऊँगी

मेरे ज़ज्बात तो बहते हैं किसी दरिया से
मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी

Comments

10 responses to “मैं ग़ज़ल बन किसी कागज़ पर बिखर जाऊँगी”

    1. suman dhingraduggal Avatar
      suman dhingraduggal

      Thanks

    2. suman dhingraduggal Avatar
      suman dhingraduggal

      शुक्रिया आपका

  1. Thakurdas Veervani Avatar
    Thakurdas Veervani

    हकीकत जब भी बया होती है,
    गजल बन यूँ ही जवा होती है।

  2. dilip mewada Avatar
    dilip mewada

    छूना मत तल्ख़ हक़ीकत भरे हाथों से
    ख्वाब नाज़ुक हूँ मै आँखों का बिखर जाऊँगी…. waah bahut hi umdaa sher !

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