जन्म लेकर साथ तुम मेरे पली थी
भेदभावों के समन्दर में वहीं थीं
में पला नाजों से लेकिन तुम नहीं
कौन कहता पीर मन की अनकहीं
पूज्या कहकर लड़कियों की कैसी साधना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना|1|
मैं पढ़ा, लेकिन रही तुम अनपढ़ी
मैं खड़ा आगे रही तुम पीछे बढ़ी
मैंने जो भी माँगा वो मुझे मिला
लेकिन तुमसे ये कैसा सिला
चंचला तुम आगे से लड़की होना न मांगना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |2|
मैंने महसूस की थी तुम्हारी मजबूरी
हर ख्वाहिश रहती थी तुम्हारी अधूरी
मेरी शादी में जितना लेना चाहते थे
तुम्हारी शादी में उतना देना चाहते थे
लेकिन मेरी तरह तुम्हारी मर्जी क्यों न पूछना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |3|
मुझे घर में रखा तुम्हें बाहर भेज दिया
तुम पराई हो गयीं मुझे दिल में सहेज दिया
जिस घर को तुमने सजाया था वो मेरा है
जो किसी और ने सजाया था वो तेरा है
खुद अपने घर को छोड़कर ये कैसा रहना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |4|
तुम लड़की होकर इतना कैसे सहती हो
अपनों को छोड़कर दूसरों में कैसे रहती हो
में लड़का होकर भी घर से अलग नही रह सकता
जो तुमने सहा उसका दसवां भी नही सह सकता
ये दर्दों का सिलसिला कब तक है सहना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |5|
मेरी भी गलती थी लेकिन क्या करता
तुम्हारे लड़की होने का खामियाजा कैसे भरता
मैं कुछ न कर सका मुझे इसका अफ़सोस है
मैं लड़का हूँ इसमें मेरा भी दोष है
हो सके तो मुझे माफ़ करते रहना
बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |6|

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.