मैं आज भी गमो का क़र्ज़ चुकाते हुए,
अपनी सारी खुशियां दाँव पर लगाये बैठी हूँ।
कौन कहता है सिर्फ बेवफा होती है औरत,
मैं अपनी वफ़ा साबित करने में अपना दामन ,सबकी बातों से छलनी करवाये बैठी हूँ।
आज भी इस ज़िन्दगी की दौड़ में खुद पर बाज़ी लगाये बैठी हूँ।
कौन कहता है वो बदनाम गालियां बस बदनामी दे जाती है,
मैंने तज़ुर्बे के साथ वहाँ से शौहरत को पाते देखा है।
मैं उनके गमो को भुलाने के लिए घर से क्या निकली उस दिन,
आज तक अपनी ख़ुशियों का पता गवाएं बैठी हूँ।
आज भी ज़िन्दगी में हम उनके ठुकराये हुए बैठी हूँ।
कौन कहता है ज़माना ज़ुल्मी है,
हम ज़माने को बदलने को उसके आज भी हर सितम भुलाये बैठी हूँ।
कौन कहता है हम पत्थर दिल है ,
हम आरसे और ज़माने से मोहब्बत में दिल लगाये बैठी हूँ,
कौन कहता है दिल नही टूट्ता हमारा
साहब इन गालियों में खुद को आज़माये बैठी हूँ।
आज भी हम बस खुद को खो कर
उनको तलाश करने में मग्शूल हुए बैठी हूँ।
कौन कहता है मग्शूल है हम खुद में,
मैं तो आपमें समाये बैठी हूँ।

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