छु न सके हथियार जिसे, उसे वो नजरो से घायल करते रहे,,
हम भी बने हिम्मती इतने,, वो वार करते रहे, हम हलाल होते रहे!!
कल तक मिल्कियत की जिसकी मिसाले देता था जमाना,
उसे ही वो होठों के जाम पिलाते रहे,, हम भी शौक से पीते रहे!!
कुछ तो बात हैं कान्हा, जो सितारे उसे चंदा समझ लेते हैं अक्सर,,
काश!! वो भी मेरी ख़ामोशी समझ पाए और हम भी उन्हें देखते रहे!!
छु न सके हथियार
Comments
11 responses to “छु न सके हथियार”
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Nice one friend
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Shukriya dost
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kuch kaha nahi usne kabhi
or me bahut kuch sunta raha… 🙂-
Kya baat hain sumit bhai,,,, Shandaar …
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bahut achi kavita ankit bhai
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Shukriya dost
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एक पर एक शानदार …..पेशकश
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वाह बहुत सुंदर रचना
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Good
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वाह
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उसे ही वो होठों के जाम पिलाते रहे,, हम भी शौक से पीते रहे!!
वाह क्या बात है लाजबाब
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