ज़माने के आईने में चेहरे सभी अजीब दिखते हैं,
सच से विलग मानों जैसे सभी बेतरतीब दिखते हैं,
जब भी खुद को खुद ही में ढूंढना चाहते हैं हम,
अपने ही चेहरे पर गढे कई चेहरे करीब दिखते हैं,
ये कैसी तालीम ऐ एतबार है इस बेशर्म ज़माने की,
जहाँ मज़हब के नाम पर आपस में बटें हम गरीब दिखते हैं,
फरिश्तों से भरी इस मोहब्बत की सरज़मी पर अक्सर,
क्यों आपस में ही उलझे हुए हम पैदाइशी फ़कीर दिखते हैं।।
राही (अंजाना)
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