पनाह
मेरी अभिलाषा को समझो माँ
स्वर्ग सी पृथ्वी पर दे दो पनाह
बडी सुकून मिलती है माँ तुझसे
क्यो मारना चाहती हो मुझ अभागन को।
अभी तो हूॅ मैं तेरे गर्भ में माँ
मुझको क्यो डराती हैं
बस मैं इतना चाहती हूॅ
पनाह दे दो मुझ अभागन को।
बेटा-बेटी का प्रश्न हो क्यो रखती
हर पल तुम्हारी मान करूगी
समाज मे रहकर सम्मान दिलाऊगी
बेटे की तरह मैं पहचान दिलाऊगी।
मेरी यह अभिलाषा सुन लो
मुझको भी अपना लो माँ
मैं हूॅ छोटी सी तितली
संसार में मुझे आने तो दो।
बसन्त की बहार लेकर आऊँगी
संसार को खुबसूरत बनाऊंगी
अच्छे बुरे की पहचान कर
माँ तुझको महान बनाऊंगी।
सत्य अंहिसा की लडाई से
देश को अपने बचाऊंगी
शंमा की तरह जलकर मैं
समाज को रोशन कर जाऊंगी ।
मैं हूॅ तेरी नन्ही गुडिया
ना मारो माँ मुझे गर्भ में
यही है मेरी माँ अभिलाषा
क्यो नही सुनती मेरी भाषा।
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
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