इश्क़

इश्क आंखों में डूबा रहता है,
रोम- रोम में रहता है।

लबों को छूकर जाता है ,
जग में तन्हा कर जाता है।

सरगोशी सी कर जाता है,
गुपचुप सी हंसी दिलाता है।

जाने क्या क्या कह जाता है
जग सतरंगी कर जाता है

निमिषा

Comments

2 responses to “इश्क़”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Wah

  2. Abhishek kumar

    Good

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