गुनाह साबित भी न हुआ,
गुनहगार कहलाया गया मैं।
सीने से लगाया भी गया,
फिर बार बार ठुकराया गया मैं।
कई बार तोड़ा फिर जोड़ा गया,
फिर जोड़ कर बनाया गया मैं।
कभी जुगुनू आँखों का बताया गया,
कभी रातों को यूँ जलाया गया मैं।
कभी सपना तो कभी हकीकत से,
वाकिफ कराया गया मैं।
हर बार अपनी ही नज़रो में गिराया गया मैं।।
पहचानते सब थे पर पहचान की नहीं किसीने,
नाम जब पूछा तो राही अंजाना बताया गया मैं।।
राही अंजाना
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