है मोल कहाँ इस दुनिया में
जो बूंद एक का चुका सके।
मात पिता का कर्ज है कोई
दिल देकर भी मुका सके।।
कहना कभी विरुद्ध नहीं।
होके इन पर क्रुद्ध नहीं।।
सेवा में होवे कमी नहीं।
आँखों में आए नमी नहीं।।
वरद हस्त हो इनका जिसपर
उसे ‘विनयचंद ‘कौन झुका सके।
है मोल कहाँ इस दुनिया में
जो बूंद एक का चुका सके।।
कर्ज माता पिता का
Comments
15 responses to “कर्ज माता पिता का”
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Very nice
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Thank you very much
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सुन्दर रचना
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धन्यवादः
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Sundar
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धन्यवाद
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Nice
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Thanks
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Nice
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Thanks
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Wah
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Thanks
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बढ़िया
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ਧਨਵਾਦ
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सही कहा
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