दर्पण

सीसा का एक टुकड़ा हूँ
कहते लोग मुझे हैं दर्पण।
गुण औगुन को दर्शाने
नर समाज को मेरा समर्पण।।
सबको उसका रूप दिखाता।
मेरे सम्मुख जो भी आता।।
कीट पतंग और नर तन।
मैं तो हूँ एक दर्पण।।

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5 responses to “दर्पण”

  1. क्या पंक्तियाँ हैं

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