कितना सरल था गांव का जीवन

कितना सरल था गांव का जीवन
गले में चुन्नी बाल में रीवन
बेरी के नीचे बच्चों की भीड़ थी
बुजुर्ग परिवार की एक दृढ़ रीड थी
दादा की ज्ञान की महफिल का लगना
आंख बचाकर अपना निकलना
चांद तो यूं ही घमंड में चूर था
चुननी पे तारे थे घूंघट में नूर था
लकड़ी की गाड़ी का टूटा खिलौना
मां के पल्लू में सिमट के रोना
चार पाले का खेल पुराना
गली में जाकर कंचे बजाना
बात ना माने के खेलने जाना
पिता का कान पे चाटे बजाना
घंटों पिता की डांट को सुनना
जो ना सुना तो डंडा उठाना
कान तो अपना सुन्न है भाई
आकर बचाती अम्मा ताई
करें शरारत बैठे ना टिक के
हम तो भैया ढीट थे पक्के

Comments

8 responses to “कितना सरल था गांव का जीवन”

  1. Kanchan Dwivedi

    Wah,,👌👌

    1. Priya Choudhary

      🙏🙏🙏

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