Priya Choudhary, Author at Saavan's Posts

महफिल

जाने के बाद तुम्हारे हम दोस्त तो बनाते हैं वो महफिलों में खो जाते हैं हम फिर अकेले हो जाते हैं »

शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है

शक्ति संपन्न की जनक दुलारी जब तुमने लांछन लगाया था चाहती प्रलय वो ला सकती थी धरती की गोद में सो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है धरती पर एक कण बचता जो काली शांत ना होती तो अर्धांग की छाती पैर धारा फिर दुख संताप में खो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है जब क्रोध में नारी रोए तो घर में महाभारत हो जाती है अपने परिवार में शांति रहे आंसू से क्रोध को धो जाती है शुक्र मनाओ कि वो रो जाती है जाने कितनी... »

सीरत

कोई दिल दरबारे खास बने तो जान निछावर करते हैं हमें सूरत की प्रवाह नहीं सीरत से मोहब्बत करते हैं »

क्रांति की धारा

मेरे देश मुझे तेरे आंचल में अब रहने को दिल करता है जो जख्म दिए अंगारों ने उसे सहने को दिल करता है कांटो पर जब तू चलता था हम चैन से घर में सोते थे हम देश पराए जाते थे तेरी आंख में आंसू होते थे क्रांति की आग में अर्थी थी यह खून से रंग दी धरती थी हर मां की आंख में आंसू थे चौराहे लाश गुजरती थी सीने पर जख्म हजारों थे सुनसान यह गलियां रहती थी यह वेद कुरान भी ठहर गए आंसू की नदियां बहती थी मैंने हिमालय की... »

आखिर क्या बदला

🥀आखिर क्या बदला बेटी के लिए 🥀 जब पिता की तरफ से दहेज आता था तो पति कहता था तो कितना लाई तेरे आने पर पति की तरफ से दहेज आता है तो पति कहता है मैंने कितना दिया तुझे लाने पर »

ज्ञान की वैशाखी

💐 शायरी 💐 पंछियों के बगीचे आसमान में होते हैं बुद्धिमानी के चर्चे जहान में होते हैं उठाकर जो चलते हैं ज्ञान की वैशाखी हजारों सितारे उसकी शान में होते हैं »

सकरात की रंग

आज मैं खुश हूं सभी बुराई पोंगल पर्व में झोंक जलधर फाटक आज ना बंद कर पतंग ना मेरी रोक सजि पतंग वैकुंठे चली थी अप्सरा संग करे होड़ रंभा मेनका झांक के देखे किसके हाथ में डोर बारहअप्सरा सोच में पड़ गई कैसी यह रितु मतवाली कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक सबकी पीली डाली सब वृक्षों की डाल से उलझे पवन के खुल रहे केश केशु रंग फैलाते फिर रहे कहां है कला नरेश नदी नहान को तांता लग रहा मिट रहे सबके रोग मूंगफली ,खिचड़ी... »

सकरात के रंग

आज मैं खुश हूं सभी बुराई पोंगल पर्व में झोंक जलधर फाटक आज ना बंद कर पतंग ना मेरी रोक सजि पतंग वैकुंठ चली थी अप्सरा संघ करे होड़ रंभा मेनका झांक के देखे किसके हाथ में डोर बारह अप्सरा सोच में पड़ गई कैसी रितु मतवाली कल्पवृक्ष से धरा द्रम तक सबकी की पीली डाली नदी नहान को ताता लग रहा मिट रहे सबके रोग मूंगफली ,खिचड़ी ,तिल कुटी का देव भी कर रहे भोग »