खामोशी से निकले ही नहीं क्यों निराशशून्य है मन
क्या लाई थी जो खोकर के यूं उदासीन है तन
पलकों में जो सपने हैं वह शायद पूरे हो भी जाएं जब आज ही नहीं मेरा है तो कल के लिए क्यों घबराए।
इस आत्म हीन काया को क्यों छोड़े ही नहीं यह मन
क्या लाई थी जो खो करके यू उदासीन है तन
हां लाई थी, मैं लाई थी एक छोटा सा बचपन।
खामोशी से निकले ही नहीं।
Comments
8 responses to “खामोशी से निकले ही नहीं।”
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Nice
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Thanks
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Nyc
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Thanks
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Good
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Nice
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर रचना
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