इस घर की कैद ने भी क्या खूब काम किया
बिखरी तस्वीरों को करीने से सजा दिया
फिर से याद आए वह पुराने साथी
कुछ बिछड़े पलों को फिर से मिला दिया ।
Author: Kanchan Dwivedi
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घर की कैद
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पहली मुलाकात
जब तुझसे मेरी पहली
मुलाकात होगी
बिना बोले ही आंखों से
सब बात होगीबिताकर कुछ पल जिंदगी
के साथ तेरे
फिर से हमारे प्यार की
शुरुआत होगीतेरे चेहरे की मुस्कुराहट
से दिल को सुकून आएगा
बयां किए बगैर ही
तू लफ्जों को समझ जाएगाक्या खूब हमारे प्यार
का अफसाना होगा
जब तेरे शहर में मेरा
यूं आना होगा। -
खुशी की ट्रेन
चलो दर्द को भूल जाते हैं
हंसी की ट्रेन पकड़ कर
खुशी के संसार में जाते हैं
पुरानी यादों में से ‘कुछ’ को चुनकर
फिर से नई दुनिया बसाते हैं -
tera sath
जब हम साथ होते हैं
हाथों में हमारे हाथ होते हैं
दुनिया की उलझनों से दूर
सिर्फ हम और हमारे जज्बात होते हैं❣️❣️ -
माता-पिता का एहसान
छोटा सा एहसान कर के
लोग ताउम्र जताते हैं
कितने मासूम है वह मां-बाप
जो सब कुछ करने के बाद
भूल जाते हैं…. -
प्यारी नर्स
खुदा के फरिश्ते के रूप में तुम आती हो
होठों पर मीठी सी मुस्कान लाती हो
अपनी जिजीविषा और कर्मनिष्ठा से
टूटी आशा को जगा जाती हो
रोगियों में रोगों से लड़ने की
क्षमता बता जाती हो
हो भले ही अजनबी और अनजान चेहरा
बन जाता है पल भर में परिवार तुम्हारा
इस रिश्ते को बखूबी निभा जाती हो
खुदा के फरिश्ते के रूप में तुम आती हो।। -
बदलाव
बदले तो वो थे …..
इल्जाम हम पर लगा बैठे
हमने तो ख्वाब सजाए थे
वो तो उनको ही जला बैठे। -
मनोभाव
सब कुछ कहां कह पाते हैं
कुछ शब्द अधूरे रह जाते हैं
कुछ बातें मन में आती हैं
कुछ मन में ही रह जाती हैं
कहने को हम सब पूरे हैं
बिन लफ्जों के भाव अधूरे हैं। -
तेरी परछाई
सुनो ना मां!
मत घबरा मेरे आने से
मुकम्मल हो जाएंगे दोनों
एक नए बहाने से
तेरे पंख मेरी उड़ान होगी
जमाने में अपनी नई पहचान होगी
तेरी परछाई बन तेरे ख्वाबों
को चुन लूंगी
कह ना पाई जो तू किसी से
वह मैं सुन लूंगी
बेटी हूं तेरी , तेरा साथ निभाऊंगी
तेरे सम्मान के खातिर दुनिया
से मैं लड़ जाऊंगी
इस बेरंग जहान में आओ
रंग भरते हैं
चल ना मां एक नए सफर पर चलते हैं । -
मां
क्या लिखूं तुझ पर ?
तू खुद शब्दों की माया है,
खुद ना आ सका विधाता
इसलिए तुझे भिजवाया है।
Happy mother’s day -
बदनाम
देखते देखते
हम बदनाम हो गए
देखते देखते हम सिरफिरे और नाकाम हो गए,
कल कहते थे हम जिंदगी है उनकी
आज उनके लिए हम दास्तां-ए शाम हो गए। -
जीने की कला
वो आकर हमें हमारी कमियां गिना रहे हैं
जो खुद उलझे है जिंदगी की उलझनों में
वह हमें जीना सिखा रहे हैं……. -
दूरी
मैं खिड़की पर खड़ा था और वह दरवाजे पर
खिड़की से दरवाजे कि ये दूरी तब भी थी
जब वह मेरे पास आ रही थी और अब
भी है जब वह मुझे छोड़ कर जा रही है। -
मनमर्जियां
हां मशगूल हूं अपनी दुनिया में
मुझसे बेहतर मुझे कोई जानता नहीं
खामोश रहूं? या सवाल करू?
मेरे शब्दों को कोई पहचानता नहीं। -
आईना
आईना नहीं है आंखें मेरी
फिर भी हकीकत तो जानती हैं
ना तुम राही हो ,ना हमराही हो
फिर भी तुम्हें अपना मानती हैं । -
किस्मत
ये खुदा है जनाब !
उसके ही ख्वाब दिखाता है
जिसको हमारी किस्मत में
नहीं लिखा जाता है। -
चलो फिर से गांव चलते हैं
चलो साथी फिर से गांव चलते है
कुछ बचें होंगे पेड़ गर वहां छांव ढूंढते हैं
आम भी तो आए होंगे,जामुन भी इतराए होंगे
बचपन के फिर से वो पल ढूंढते हैं
चलो साथी फिर से गांव चलते हैं
पुरानी नीम के नीचे सब चौपाल लगाएंगे
बड़की काकी को फिर से अपने पीछे दौड़ायेंगे
बहुत रह लिया परदेस में ,अब अपने घर को चलते हैं
चलो साथी फिर से गांव चलते हैं
रखा होगा मां ने अचार , चटकारे लगाएंगे
कोयल की कुहू को हम भी दोहरायेंगे
गांव जाती सड़क पर फिर दौड़ लगाएंगे
उड़ गए हैं जो रंग जिंदगी के उन रंगों में रंगते हैं
चलो साथी फिर से गांव चलते है
गांव से निकले हैं तो खोई पहचान है
हम कल भी अजनबी थे और आज भी गुमनाम हैं
इस खाली कैनवास पर यादों को सजाते हैं
चलो साथी फिर से गांव चलते हैं। -
दास्तां -ए- सैनिक
एक सैनिक की यही दास्तां है
वैसे तो सदा वह गुमनाम होता है
हो जाए शहीद बस तभी नाम होता है
देश की रक्षा कर चिर ख़ामोशी में सो जाता है
फिर कौन याद करता है ? किसे याद आता है ?
है एक सवाल ! जो उसे भी याद आता होगा
शहादत के समय मन में कौंध जाता होगा ,
बुढ़ापे की लाठी बनने का धर्म भी तो निभाना था
रहेगा ताउम्र किसी की मांग में सिंदूर ये भरोसा भी दिलाना था
इसी उधेड़बुन में उसे फिर कुछ याद आता होगा
देश है सर्वोपरि यह सोच जाता होगा ।।
और फिर लड़ते-लड़ते चिर निद्रा में सो जाता होगा।
ऐ मेरे देश ! सैनिकों को कुछ तो मान दो
उनकी हिम्मत और जज्बे को थोड़ा सम्मान दो
माना कि रक्षक वह है पर थोड़ा कर्तव्य उठा लो तुम
उनके परिवार के खातिर थोड़ी वफादारी निभा लो तुम
आतंकवाद का सफाया कर उनकी भी जान बचाना है
है अनमोल उनकी भी जान ये विश्वास उन्हें दिलाना है
सैनिक केवल एक जान नहीं अपने परिवार की जान हैं
देश सहित ना जाने कितनी उम्मीदों का पैगाम है।
Kanchan dwivedi -
वफादारी
किसी को प्यार किसी को
प्यार की निशानियां रुला गईं
हम मजबूर थे हमें
हमारी वफादारियां रुला गईं। -
कुछ अनकहा, कुछ अनसुना
कुछ अल्फाज बचा रखे थे
उनके लिए वह आए और
बिना बोले चले गए।कुछ नजरें बचा रखी थी
उनके लिए वह आए और
बिना देखे चले गए।कुछ गीत सजा रखे थे
उनके लिए वह आए और
अनसुना करके चले गए।अपना प्यार छुपा रखा था
उनके लिए वह आए और
बेवफा बता कर चले गए। -
कोरोना से लड़ाई
अपनी इस लड़ाई से
चाहे खुद लड़ना पड़ जाए
अपनी ही परछाई से
जब बात प्रतिष्ठा की हो तो
हर व्यक्ति का अपना ओहदा है
यह बात है आत्म सम्मान की
ना हार जीत का सौदा है -
जीवन के इस मोड़ पर
मेरे बच्चे साथ निभाओगे
गर गुस्सा हो जाऊं किसी बात पर
आकर मुझे मनाओगे ?
इन सिकुड़न वाले हाथों को
क्या प्यार से तुम सहलाओगे?
बूढ़ा हूं कुछ , सुनने की शक्ति भी क्षीण हुई
कोई बात समझ गर ना आए
क्या बार-बार दोहराओगे ?
ताउम्र सभी के साथ रहा
इस बात को क्या भुला दोगे।
गर घर छोटा पड़ गया तेरा है
क्या वृद्धाआश्रम भिजवा दोगे?
तेरी चांद सी रोशन दुनिया में
माना कुछ बेरंग सा हूं
जीवन की ढलती बेला में
आखिर तेरे बच्चे जैसा हूं।।
-Kanchan dwivedi -
पलायन करते बेचारे लोग 😢😢😢
बेबस होकर वो लौटे हैं
श्रमवीर कहलाने वाले हैं
जिस घर में आराम से लेटे हो
उसकी नींव बनाने वाले हैं😢
घर मंदिर और कुआं पोखर
निज श्रम से उसने सींचे हैं
उसकी मेहनत का फल देखो
उपवन और बाग बगीचे हैं
अश्रु सहित नयन देखो 😢😢
उम्मीद से तुम्हें निहार रहे
मदद करो कुछ मदद करो 🙏
बेबस होकर पुकार रहे
भूखे पेटों के मंजर ने
शहर उसे भिजवाया था
आज वही मंजर देखो
वापस गांव ले आया है… -
पुनर्मिलन
अहम तोड़ दो दिल फिर से मिले
धड़कनें तेज हुईं
आंखों से बरसात हुई
ऐसा लगा जैसे
फिर से पहली मुलाकात हुई -
कोरोना को हराना है
एक जुनून ही हमें आगे ले जाएगा
आगे की कहानी भी वही बताएगा
मायूसी जाएगी
नई सुबह फिर आएगी
सन्नाटा जाएगा
कल आज और
आज कल बन जाएगा
सन्नाटा चीर कर फिर से विश्व मुस्कुराएगा
कुछ सीख देखकर यह दौर गुजर जाएगा।। -
विपदा की घड़ी
विपदा की घड़ी जब आती है
हमें व्यवस्थित होना सिखाती है
एकता का महत्व समझाती है
अपने पराए में भेद बताती है
धैर्य परिश्रम सहयोग समन्वय
और अनुशासन का पाठ अवश्य पढ़ा जाती है
विपदा की घड़ी जब आती है…. -
संदेश ख्वाबों का
रात की दीवार पर लिखा ख्वाबों का संदेश
ए चंदा पहुंचा देना ‘अपने’ रहते परदेस….. -
नक्सलियों से कैसी हमदर्दी
माताओं ने लाल खो दिए
बहनों ने फिर भाई,
घर में छुपे दुश्मनों से
कैसे जीतोगे लड़ाई?
नक्सलियों के हमले से
धरती लाल हो जाती है,
फिर किसी घर मे कोई
ज्योति बुझ जाती है
नक्सलियों पर कार्रवाई हो
तो अधिकार हनन हो जाता है
शहीद जवान हो जाएं
तब बुद्धिजीवी समाज सो जाता है
ऐसे गद्दारों को मारो
क्यों प्रहार ना करना
जब उनकी निष्ठा खंडित है
तो क्यों बचाव करना ….. -
जल खुद एक जीवन है
जल खुद एक जीवन है
आओ इसे बचाते हैं
फिर से भर जाएंगी नदियां
आओ कदम उठाते हैं
आज ही जब सब खो दोगे
तो पीढ़ी को क्या सौंपोगे
अपनी जिम्मेदारी का बोझ
फिर किसके ऊपर थोपोगे
अभी समय है जागो मानव
थोड़े अच्छे काम करो
जल खुद एक जीवन है
इसको जीवन दान करो -
बीती शामें
दिल कोई तहखाना है
जिसमें दफन हजारों यादें हैं
कुछ खट्टी हैं कुछ मीठी हैं
बीती शामो की बातें हैं -
बिछड़ा जमाना
उनसे बिछड़े जमाना हो गया है
फिर से दिल बेगाना हो गया है
नहीं बाकी रही ख्वाहिश कोई
यही जिंदगी का अफसाना हो गया है। -
दो शब्द
एकता की खुशबू जब महकती तो सारी दुनिया चहकती है
आओ एक काम करें आज का दिन देश के नाम करें। -
गौरैया
20 मार्च यानी गौरैया दिवस ….
आज तुम्हारा दिवस है प्यारी गौरैया ,कहने को तुम घरेलू चिड़िया कहलाती हो लेकिन स्वार्थी मनुष्यों ने तुम्हें घर से बेघर कर के पेड़ों पर भी अपना स्वामित्व जता दिया है आज नि:शब्द सी तुम निराझार से तुम्हारे भाव हम संवेदनाहीन मनुष्यों से एक ही सवाल पूछते हैं कि
“कहां जाएं हम ?”😞 -
जागरूकता ही बचाव है
यह दौर गुजर जाएगा इस वैश्विक आपदा के बावजूद हम इस पर विजय पाने में कामयाब अवश्य होंगे। भरोसा रखिए हमारे डॉक्टर कोविड -19 का इलाज और वैज्ञानिक निश्चय ही इसका मूल कारण खोज लेंगे तब तक एक जिम्मेदार व्यक्ति बनिए स्वयं और बाकियों की सुरक्षा सुनिश्चित करिए👍
स्वस्थ रहे सुरक्षित रहे 🙏
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चलते जाना
कुछ साथी साथ निभाएंगे
कुछ बीच रास्ते में छोड़ जाएंगेकुछ विश्वास तुम पर दिखाएंगे
कुछ हर वक्त नीचा दिखाएंगेना रुकना ना घबराना
बस चलते जानामिल जाएगी एक दिन मंजिल
वहां खड़े होकर अपनी सफलता का परचम लहराना। -
गुलजार शामें
सभी को मयस्सर नहीं जिंदगी की गुलजार शामें
किसी को जलते दिनों से भी काम चलाना पड़ता है…. -
तेरी बातें
तेरी बातें ही है जो एक उम्मीद से हमें तेरे पास ले आती हैं वरना सुकून -ए -जिंदगी तो हमें अकेले रहने में ही मिलता है……
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किताब -ए -जिंदगी
किताब-ए- जिंदगी अपनी लिखी है पेन से हमने
जिसे मिटाने की गुंजाइश कहां बख्शी है… -
सच्चाई
मां देख! पहले गांव छोटे थे
अब शहर छोटे हो गए हैं
पहले कमरे छोटे थे,
अब घर छोटे हो गए हैं
सच कहूं ! तो पहले लोग सच्चे थे
अब अपने झूठे हो गए हैं…….. -
अपने
भरोसा अपना पर नहीं गैरों पर कर लीजिएगा जनाब
“अपने” अपने कहलाने के लायक नहीं है।
रूठना है तो खुद मान जाइएगा जनाब
यहां कोई मनाने के लिए नहीं है। -
खुशबू तेरी
घुली है हवाओं में खुशबू तेरी
शायद तेरे आने का पैगाम लाती है
ना ठहरती है ना जाती है शायद
दिल तोड़ने का सामान लाती है। -
सच्चे भारतीय
माना की नियत के कच्चे हो फिर भी कुछ तो मान करो
आते हैं जो मेहमान देश में उनका ना अपमान करो
सामान तो पार किया देश को भी बदनाम किया
अपनी हरकतों से भारत को शर्मिंदा सरेआम किया
आदतें बदलो महान बन जाओगे
सच्चे भारतीय बन देश को आगे बढ़ आओगे। -
खामोशी
खामोशी भी एक सिलसिला -ए-गुफ्तगू ही है
खैर छोड़ो तुम्हारे बस की बात नहीं……. -
नादानियां
मेरी नादानियों
का सिला यह मिला हमको हम बदनाम हो गए और वह समझदार बने बैठे हैं…… -
बचपन के कुछ दिन
फिर से बचपन में लौटना है आज मुझे
कुछ पल फुर्सत के जीना है आज मुझे
मां की गोद में रखकर सिर सोना है आज मुझे
बहन की चोटी खींच आज फिर दौड़ लगाना है
छिपकर पापा के पीछे से उसे चिड़ाना है। -
तेरी अदा
तेरी अदा ने हमको दीवाना कर दिया
मुझे मेरी ही दुनिया से बेगाना कर दिया
आज सोचते हैं कि काश ना मिले होते तुझसे
काश कि ना फना होते तुझपे। -
स्त्री की पहचान ।
ढो रही हूं एक बोझ सिर से लेकर पांव तक
खोज रही हूं एक दिशा धूप से मैं छांव तक
मीलों सा लंबा सफर जिंदगी का है मेरी
फिर भी रुकी है वहीं जहां शुरू हुई थी घड़ी
पहचान है क्या मेरी आज तक मैं ढूंढती,
अबला होकर क्या है पाया आज तक मैं सोंचती
“कौन हूं मैं ” आईने के सामने जाकर आज तक मैं पूछती
खड़े होकर चौराहे पर हर नजर को झेलती
हंसने वाली हर कली हर गली से पूछती
कब मिलेगी? राह मेरी कब मुझे पहचान मेरी
एक मील बाद भी क्यों अधूरी शान मेरी
मिल सकी क्यों नहीं अब तक पहचान मेरी ।
हर जिंदगी शुरु है मुझसे ,हर जिंदगी मुझ पर खत्म
फिर भी ढाए जा रहे हैं मुझ पर ही बरसों से सितम
ठान लिया है अब मैंने दूर तक जाऊंगी मैं
पहचान है क्या मेरी खुद ढूंढ लाऊंगी मैं
दे सकते अधिकार नहीं तो बस इतनी आजादी दो रोक सकूं खुद ही मैं खुद अपनी बर्बादी को।।
कंचन द्विवेदी -
एकता
इस मंत्रमुग्ध सी बेला को आओ हसीं बनाते हैं
जात धर्म को तज करके हम तिरंगा धारी बन जाते हैं
मन में जब कोई मैल न होगा कौन हमें लड़ायेगा
विश्व गुरु बन कर भारत फिर सर्वश्रेष्ठ बन जाएगा। -
खामोशी से निकले ही नहीं।
खामोशी से निकले ही नहीं क्यों निराशशून्य है मन
क्या लाई थी जो खोकर के यूं उदासीन है तन
पलकों में जो सपने हैं वह शायद पूरे हो भी जाएं जब आज ही नहीं मेरा है तो कल के लिए क्यों घबराए।
इस आत्म हीन काया को क्यों छोड़े ही नहीं यह मन
क्या लाई थी जो खो करके यू उदासीन है तन
हां लाई थी, मैं लाई थी एक छोटा सा बचपन। -
त्योहार मिलन का
बैर भाव से ऊपर उठकर
आओ रंग लगाते हैं,
होली है त्यौहार मिलन का
मिलकर इसे मनाते हैं।