बेहया रात से गले मिल कर
आई है सुबह मेरी
कि धूप छांव का आलम
लाई है सुबह मेरी
मेरी गज़ल भी थी जो लिखी थी एक दिन मैने
उसकी इबादत में
उस गज़ल के कुछ पन्ने समेट लाई है सुबह मेरी
किसे पुकार रहा है ये मेरा जिगर
बस एक फ़िक्र और भी लाई है सुबह मेरी
अदावतें निभा कर था जो खो ही गया
उसे ढूँढ कर लाई है सुबह मेरी
राहे सुखन में मिट गया तगाफुल उसका
हमनवाई का बहाना लाई है सुबह मेरी
सुबह मेरी
Comments
11 responses to “सुबह मेरी”
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Nice
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थैंक्स
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सुंदर अभिव्यक्ति
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थैंक्स
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Nice
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धन्यवाद
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Awesome
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थैंक्स
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Nyc
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धन्यवाद
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बहुत सुंदर
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