करिश्मा अपने वतन के

मेरा आन वतन, मेरा बान वतन, मेरा शान वतन।
गैरो में दम कहाँ जो करे, हमारे वतन को पतन।।
अनेक आए अनेक गए, बाल न बांका कर सका।
मेरा भारत भारत ही रहा, कोई न इसे झुका सका।।
मशाल ले कर जंग में कूदना, यही हमारी करामाती है ।
वतन पे हो जाएं हँस के कुर्बान, यही हमारी शरारती है ।।
कहे कवि- दुश्मनो ने राहों में कांटे ही कांटे बिछा दिए।
हम कांटे को सिंच कर नेहरू के लिए गुलाब बना दिए।।

Comments

7 responses to “करिश्मा अपने वतन के”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुन्दर रचना

    1. Praduman Amit

      Thanks

  2. PRAGYA SHUKLA Avatar
    PRAGYA SHUKLA

    Good

  3. अतुल्य भारत

  4. Satish Pandey

    अच्छी रचना

  5. क्या बात है प्रदुमन जी आप वीर रस से परिपूर्ण रचनाएं बहुत लिखते हैं

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