जिक्र ए जहन
किससे करें हम
लफ़्ज हैं दबे दिल में कहीं
शायद डर रहें हैं
बाहर निकलने से
कोई समझेगा या नहीं
क्या कहेगा कोई
इसी उधेड़बुन में
खोई रहती हूं अपने ख्यालों में
करती हूं इंतजार
उस पल का
जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
जहन की दीवारों को
जज्बात
Comments
12 responses to “जज्बात”
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बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति
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Thank you
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बेहतरीन
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Thanks sir
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Nice lines
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Thanks ma’am
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Umda
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Thanks
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“जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
जहन की दीवारों को” में अनुप्रास से अलंकृत कर मन में छिपे जज्बातों को पंक्तिबद्ध करने का सुन्दर प्रयास है. वाह-

Thanks sir
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गागर में सागर भर दिया है
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Thanks
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