लालच में न धंस

यूँ तो मानव सोचता है
मैं सदा जीवित रहूँगा,
सब चले जायेंगे लेकिन
में यहां चिपका रहूँगा।
पर समय का चक्र कोई
रोक पाता है नहीं,
कब है आना कब है जाना
जान पाता है नहीं।
इसलिए तू मोह के
जंजाल में ज्यादा न फंस,
जिंदगी जी ले खुशी से
और लालच में न धंस।
— डॉ सतीश पाण्डेय

Comments

8 responses to “लालच में न धंस”

  1. Geeta kumari

    👏👏… बेहतरीन रचना

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      Thanks

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