दुनिया में छाया कैसा मंजर है
धरा सूनी सूनी लागे खोया-सा अंबर है
कोविड 19 से हर तरफ मचा हहाकार है
बस एक संजीवनी बूटी की फिर से दरकार है ।।
कहाँ छिपे हो संकट मोचन,संकट मानवता पे आई है इस अप्रत्याशित बीमारी ने,कितनों की दीप बुझाई है
वैद्य सुषेण की फिर से,आन पङी दरकार है
बस एक संजीवनी बूटी—–
विकसित अविकसित का इसने,फर्क मिटाया है
देख दवाई की खातिर, एक गर्वित ने हाथ फैलाया है
जी करता है, कह दा उसे, इन्कार है
बस एक संजीवनी बूटी——-
वसुधैव कुटुंबकम् की नीति का,
पालन करके दिखलाया है
अकङी,घमंडी को भी हमने नहीं कभी लौटाया है
दधीची शीवी की परम्परा को रखा बरकरार है
बस एक संजीवनी बूटी——-
संकटमोचन
Comments
11 responses to “संकटमोचन”
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सत्य कहा
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धन
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धन्यवाद
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इंतजार तो है संजीवनी का
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धन्यवाद
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धन्यवाद धन्यवाद
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वाह
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धन्यवाद
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अति सुंदर
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धन्यवाद
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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