5 Comments

  1. “आपत्ति काल कोऊ नहीं देखत
    नारी भी घर करे दूजा”
    क्षमा करें मुझे इन पंक्तियों पर आपत्ति है। वैसे शेष रचना अच्छी है।भाइयों का स्नेह दर्शाती हुई है।

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