पहली मुलाक़ात थी अधूरी सी
दूजी को हम तरस रहे,
भूल ना रहे उन लम्हों को
बादल प्रेम के उमड़ रहे।।
भूखे- प्यासे हम भटक रहे
आंखों में उनकी तस्वीर लिए,,
उनका नाम, न ठिकाना जाने
फिर भी दिन उनके नाम किए ।।
दिल बहलाने को फिर एक दिन
यूं ही लाइब्रेरी में प्रवेश किए,
किताबें प्रेमचंद्र की वो ढूंढ़ रहे
हम अपने प्रेम को तलाश लिए।।
मुस्कराकर फिर कुछ बातें हुई
और एक – दूजे के नाम मिले,
ज्योंहि अगले मिलन के वादे हुए
मानो सूखे में बदल बरस पड़े।।
इस मिलन से ही फिर
कहानी में नई शुरुवात हुई,
दो दिलों की फिर यूं
ख़त्म दूसरी मुलाक़ात हुई।।
अनुज कौशिक
अगर आपने “पहली मुलाक़ात” नहीं पढ़ी तो मेरी प्रोफ़ाइल पर को भी पढ़ें।
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