नटखट, ओ लल्ला मोरे

नटखट, ओ लल्ला मोरे तू काहें मोहे खिझायों।
संग सखा तू पुनि-पुनि मटकी पर नज़र लगायो।।
सब ग्वालन से मिलकर झटपट माखन खायो।
नटखट ओ लल्ला मोरे तू काहें मोहे खिझायों।।

मैया, ओ प्यारी मैया मैं मन को न रोक पायो।
मटकी में माखन देख जी ललचाओ।।
तू तो जानत हैं मोहे माखन बहुत सुहायो।

नटखट कान्हा मोरे, तिन्ही सकल हृदय में बस जायो।
तोरी मधुर बोली मोरे कानों को अति सुहायो।।
मनमोहक रूप को देख मोरे नयन तोहे निहारत जायो।
अद्भुत अखियन तिन्ही पाई, देखत ही इन कमल नयनों को इन्हीं में संसार खो जायो।।
झील-सी इन अखियन में तोरी मैया सुध भूल जायो।
इहि खातिर यर मैया तोरी तोहे खुल के न डाट पायो।।
ओ लल्ला, ओ कान्हा मोरे तू काहें मोहे खिझायों।।

Comments

13 responses to “नटखट, ओ लल्ला मोरे”

  1. Shiwani Maurya

    जिन्हें भी पसंद आये
    Like, comment जरूर करे।

  2. Chandrika maurya

    Very nice poem.
    Good keep it up.
    👌👌

  3. Geeta kumari

    सुंदर भाव

  4. New Charms

    Wow these lines are too good…

  5. New Charms

    Looking forward to get more such things from you!!

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बेहतरीन

  7. Sofi Maurya

    Very nice poem❤❤

  8. Devansh Maurya

    Good Nice lines Keep it up👌🏻👏

  9. Devansh Maurya

    Impressive!!

  10. Mandrika Maurya

    ʘ‿ʘ So cool🤩

  11. Chandrika maurya

    बेहद सुंदर रचना है।

  12. Chandrika maurya

    इस रचना से श्री कृष्ण के बाल युग का सलोनापन दिखाई देता है।

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