हल तो खोजना होगा

बारह बरस की कोमल कली थी,
अपने ही घर पर, पर, अकेली थी।
जाने कहां से आए थे दानव,
दानव ही थे वो, बस दिखते थे मानव।
कोयल सी बोली थी, दिखने में भोली थी,
अपने ही घर पर, पर, अकेली थी।
अपने घर में भी सुरक्षित ना हो तो,
किसका ये दोष है तनिक सोचो तो
क्या दोष है न्याय – प्रणाली का,
मिलती नहीं सज़ा जल्दी से,
हल तो इसका ,खोजना ही होगा
देर ना करनी, बस जल्दी से।

Comments

14 responses to “हल तो खोजना होगा”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar

    भावपूर्ण ,मार्मिक

  2. Geeta kumari

    धन्यवाद मोहन जी।

  3. Satish Pandey

    अत्यंत मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता

    1. Geeta kumari

      आज- कल की ही एक दुखद घटना पर आधारित 😥

  4. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत हीं मार्मिक भाव

    1. Geeta kumari

      🙏

  5. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    पुनरुक्ति अर्थालंकार की पूट
    “पर, पर” का सुन्दर प्रयोग
    अतिसुंदर

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏

  6. Rishi Kumar

    उनके घर भी जल जायेगे,
    जो सोच बना ऐसे आयेगे|
    एक दिन बेटी बोलेगी-
    फिर पापा भर- भर आसू बहायेगे|
    यह मेरी कविता का अंश है
    ✍🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

  7. Geeta kumari

    बहुत सुंदर
    धन्यवाद आपका 🙏

  8. Devi Kamla

    Waah waah

    1. Geeta kumari

      Thank you Kamla ji

  9. Piyush Joshi

    अतिसुन्दर

    1. Geeta kumari

      Thank you Piyush ji

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