13 Comments

  1. “नज़र तेरी, जुबां तेरी , ताज्जुब है कि इस पर भी,
    नज़र कुछ और कहती है , ज़ुबां कुछ और कहती है”..
    ………वाह प्रज्ञा जी सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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