बेटी

पापा के लिए तो
परी हैं बेटियां
हर दुख दर्द में
संघ खड़ी है बेटियां
फिर क्यों कहते हैं कि
तू धन है पराया
क्यों बेटी का कमरा भुला दिया
जब घर बनाया
बेटी नहीं तू बेटा है
कहते हैं सब अपने
फिर वक्त पर क्यों
भुला दिए जाते हैं सपने
बेटी कभी घर में
हिस्सा नहीं लेती
क्या इसीलिए वह घर का
हिस्सा नहीं होती
गूंजा था हर कोना
बेटी की किलकारी में
क्यों आज पराए हो गए
हम रिश्तो की बलिहारी में।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

7 responses to “बेटी”

  1. आपकी रचना बहुत खूबसूरत है सच में ऐसी ही होती है बेटियां

  2. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  3. Suman Kumari

    संग खङी हैं बेटियां ।
    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Satish Pandey

    बहुत ही सुंदर और यथार्थ अभिव्यक्ति है। आपने बहुत सुन्दर रचना की है।

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