लैला-मजनू

लैला मजनू ने सिखाया
मोहब्बत में फना होना
वरना हम तो तेरे साथ
जीने के ख्वाब देख रहे थे
जो ख्वाब कभी पूरे हो
नहीं सकते थे
हम तुझसे जुदा रह नहीं
सकते थे
मरने की फिजूल बातों
पर ना गौर कभी किया था
तेरे साथ ही रहने को
उतावले रहते थे
पर याद आई मुझको
मजनू-लैला की जिन्दगानी
जो जी रहे थे संग में
मरने की उन्होंने ठानी
एक-दूजे के लिए ही
जी रहे थे दोनों
जिस्म तो दो थे पर
जान एक ही थी
एक की थमी साँसे तो
दूजे की धड़कन
ऐसी मिसाल से थर्राया सारा
आलम !
अब हम भी ना जियेंगे जो तुम
ना रहोगे
सारे दुःख हम सहेगे
आँसू तुम पियोगे
ना हम ही रहेंगे ना तुम ही
रहोगे
दूरियां ना सहेंगे
जन्नत में पास तुम रहोगे…

Comments

3 responses to “लैला-मजनू”

  1. Satish Pandey

    लैला-मजनूं द्वारा मोहब्बत में स्वयं की जान देने के कथ्य को कवि द्वारा आज के प्रेमी जोड़े के साथ तारतम्य बैठाने की खूबसूरत कोशिश की है। भाव प्रधान कविता अपने कथ्य को पाठक तक पहुंचाने में सफल प्रतीत होती है। सुंदर रचना

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