इक ज़माना था

इक जमाना था
लोग प्यार करते थे
पर बताते न थे
इक जमाना है
प्यार का तो पता नहीं
पर रोज ही जताते हैं

प्रेमी के सुख दुःख का
कितना ख्याल था
बुरा न मान जाये कही
हर समय ही ध्यान था

उम्र गुजर जाते
पर बताते हुए डरते थे
कितने जिंदादिल थे
दुःख सहकर ख़ुशी देते थे

महबूब की चाहत अगर कोई और हो
उसकी चाहत का भी ख्याल करते थे
उनकी बड़ी गलतियों का भी
न दिल में मलाल रखते थे

अब तो ये आलम है की
अपनी फिक्र में ही सब डूबे हैं
चहेतो की क़द्र कहाँ हैं
अपनी ही शौख से न ऊबे हैं

प्यार का ढाबा है पर
जान तक ले लेते हैं
न जाने कितनो से ही
एक ही खेल खेले हैं

Comments

5 responses to “इक ज़माना था”

  1. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति भाईजी

  2. Geeta kumari

    पुराने जमाने और नए जमाने का बखूबी यथार्थ चित्रण किया है राजीव जी बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ती और सुंदर प्रस्तुतीकरण । बहुत सुंदर रचना है सर ।

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