इंसान कहाँ मानते हो तुम

नहीं सोंचा था हमनें
इतना बैर मानते हो तुम
हम छिड़कते हैं जान तुम पर
और मुझे गैर मानते हो तुम
दूरियों से प्यार बढ़ता है
ये जमाने को कहते सुना करते थे
अब आया समझ में
मुझे क्या मानते हो तुम
बेकार ही है तुमसे दिल
लगाना मेरा
मेरे प्यार को प्यार
कहाँ मानते हो तुम
सबकी रखते हो खबर और
सबका खयाल
मुझको इंसान कहाँ मानते हो तुम…

Comments

10 responses to “इंसान कहाँ मानते हो तुम”

  1. Geeta kumari

    कवि प्रज्ञा जी की बहुत भाव पूर्ण रचना और उसकी सुंदर प्रस्तुति

  2. Rishi Kumar

    🙂👌✍

  3. सुन्दर रचना

  4. बहुत खूब अतिसुन्दर

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