‘जन्नत की हुकूमत’

दीदार बिन यार के महफिल अधूरी है

हर किसी की प्यार बिन जिन्दगी अधूरी है

मिल जाए चाहे मुझको जन्नत की
हुकूमत भी !

मेरे यार के बिन प्यार के ये प्रज्ञा* अधूरी है||

Comments

5 responses to “‘जन्नत की हुकूमत’”

  1. प्रज्ञा जी, ❤बहुत खूब👌👌👌👌

  2. This comment is currently unavailable

  3. बहुत ख़ूब

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