तुम्हारे और मेरे रस्साकशी में
पीस कर रह गये अरमान हमारे
तुम भी अपनी मर्जी के मालिक
समझे न जज़्बात हमारे ।
पर अब और नहीं
खुद पर गैर को हावी होने देंगे
अपने हक पर किसी और को
न शामिल होने देंगे ।
रस्साकशी
Comments
2 responses to “रस्साकशी”
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बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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