वह सब क्या था..??

तुम कहते हो प्यार नहीं तुमसे
मान लेती हूँ तुम्हारी बात भी
पर हम दोनों के बीच जो था
वह सब क्या था ?

रख लेते थे तुम मेरी गोद में सिर अपना
तो चैन तुम्हें आ जाता था
बाबू-बाबू कहते रहते थे
वह सब क्या था ?

कभी-कभी गलती से इजहार भी
कर देते थे
घण्टों मुझसे बातें करते रहते थे
बेचैन रहा करते थे मुझसे मिलने को
बोलो जानू आखिर वह सब क्या था ?

आता था गुस्सा तुमको जब
पास किसी के जाती थी
रुक जाती थी साँसें
जब पास तुम्हारे आती थी
छू लेते थे तुम चाय के कप के
बहाने से मेरी उंगली
नजरों से नजरों का टकराना
वह सब क्या था ?

पास आने की खातिर होते थे वादे
धड़कन की धक-धक भी बढ़ जाती थी
भर लेते थे जो तुम मुझको बाँहों में
होंठों से होंठों का टकराना क्या था ?

एक रोज तुम मुझसे मिलने आए थे
बाइक पर मुझको लेकर जब घूमे थे
रख लेते थे हाथ मेरा तुम कमर पे अपनी
ब्रेक लगाकर मुझको पास बुलाते थे
डिवाइटर देखकर कितना खुश तुम होते थे
ऊबड़-खाबड़ रस्ते पर ही बाइक चलाते थे
इसी बहाने से मैं तुमको छूती थी
तुम मेरी हरकत पर मंद-मंद मुसकाते थे

प्यार नहीं था तो आखिर वह सब क्या था
जब तुम मेरी ओर खिंचे चले आते थे
बोलो ना कुछ आखिर वह सब क्या था ?

Comments

4 responses to “वह सब क्या था..??”

  1. Geeta kumari

    प्रेम की बहुत सुन्दर भावभिव्यकती । बहुत ही भावुक रचना

  2. Anu Singla

    सुन्दर

  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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