रावण हूं

कविता- रावण हूं
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रावण हूं,
राम नही ,
राक्षस हूं,
भगवान नही,
अब की बार दशहरे में,
पहले खुद राम बनो
फिर आग लगाना मुझे|
रघुकुल की पता होगी
वे सत्य वचन पर,
अटल रहे,
चक्रवर्ती-
विश्व विजेता,
धर्म सत्य गौ,
विप्र पूजक रहे।
उस घर की,
मर्यादा थी,
वचन के कारण,
जिस राजा ने
मरघट पर काम किया,
उसी का स्वाभिमान था –
राम,
मर्यादा उनसे,
निकलती हैं,
पिता प्रेम,
कुल की मर्यादा,
के कारण
छोड़ दिया सिंहासन सारा,
पग पग बढ़ते,
चरण जिधर,
ले गुरु चरणों का,
आशीष उधर,
एक मौका दिए,
भाई भाई का दिल मिल जाए,
बाली बल में मस्त रहा,
झट प्रभु उसका अन्त किया,
अंगद आया, संदेशा लाया,
हे रावण क्यों तकरार बढाया,
माफी मिलेगी सुन रावण,
गर सीता को वापिस करेगा,
लेकिन उसने
अपमान किया,
झूठी शानों शौकत में,
राम से लड़ने का एलान किया,
दया करुणा सत्य-
युद्ध नीति जिसमें समाई हो,
वैसा राम बनो फिर आग लगाना|
मुझसे बढकर,
पापी लोभी,
हठी इंसान हैं यहाँ,
दो वर्ष की बेटी रोये
ऐसे हैं शैतान यहाँ,
मेरे पुतले से नेता दूर रहें,
चुगलखोर भ्रष्टाचारी,
रेपिस्ट दलबदलू,
संसद के इंसान यहाँ|
कहें “ऋषि” सुन जनता,
हर घर में रावण,
नहीं हो सकता,
ज्ञानी महारथी,
ग्रथों का ज्ञाता,
अब कोई नहीं बन सकता|
हर के लाए हरि कि पत्नी,
बिना इच्छा छू नहीं सकता,
बिषगड़ गये खुद खून के रिश्ते,
रावण जैसा कौन यहाँ बन सकता है
क्या देखा,
क्या देख रहा हूं,
भाई छूटा, भाई मरा,
बेटा मेघनाथ भी सो गया
हाथ लगाना,
आग लगाना,
राम जरा-
बनकर दिखना,
हे जन तब मुझे आग लगाना।
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**✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—

Comments

One response to “रावण हूं”

  1. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर भाव है।

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