मेरा मुकद्दर

ऐ खुदा !
क्यों है तू खफा
किस बात की तू मुझे
देता है सजा
मेरा मुकद्दर रूठा मुझसे
हमदम हुआ जबसे जुदा…

Comments

3 responses to “मेरा मुकद्दर”

  1. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर रचना

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