नये कपड़े, नयी उमंग,
पटाखे और डिब्बे की मिठाई ।
गरीबी में पल रहे लाल के
किस्मत में कहाँ है भाई ।।
दीप जला कर खेल कूद कर।
अपनी शौक को खुद में ही,
कभी सिमटते हुए देखा है भाई?।।
गरीब के लाल
Comments
6 responses to “गरीब के लाल”
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बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति की है आपने
आपकी इस कविता ने मुझे भाव विभोर कर दिया और शिल्प ने सावन की चकाचौंध बढ़ा दी है..
जिस तरह आपने प्रश्न अलंकार का उपयोग किया है एवं गरीब की दीपावली कैसी होती है बताया है वह काबिले तारीफ है..
मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगी गरीब के लाल यानी गुदड़ी के लाल…. -

आपकी समीक्षा ही मेरे लिए अनमोल तोहफ़ा है। आप हमेशा मेरी हौसला अफ़जाई की है। इसके लिए मै आपको तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ ।
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आभार सर आपका और मैं हमेशा ही आपके साथ हूँ
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गरीब बच्चों के भावों की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत खूब
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Nice
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