बोया था एक रोज
बड़े नाजोअंदाज से
प्रेम का बीज’
आज उसमें फल पके हैं
मायूसी और बेबसी के
बहुत लदा है वो वृक्ष
माँ अक्सर कहा करती थी
तुम्हारा बोया बीज
एक पुष्ट पौधा बनकर
बहुत फलता-फूलता है
सही कहा करती थीं माँ..!!
प्रेम का बीज
Comments
8 responses to “प्रेम का बीज”
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एकदम सत्य, बहुत सच्ची पंक्तियां लाजवाब
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सुंदर समीक्षा के लिए धन्यवाद
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Nice poem
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Thanks
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अतिसुंदर भाव
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धन्यवाद
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धन्यवाद
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