‘मधुयामिनी’
रात थी बात थी एक मुलाकात की
तू मेरे साथ था मैं तेरे साथ थी
पढ़ रहे थे तुम रात्रि में रश्मियां
आँच में तेरी मैं फिर पिघलती रही
चूड़ियों ने कहा जो था कहना हमें
पायलों की झनक में था सोना तुम्हें
जुल्फों की छांव में तुम सिमटते रहे
हम तो खोते गये तुमको पाते हुये
चुम्बनी बारिशों में था भीगा बदन
हम तुम्हारी रगों में समाते गये
रातभर ना करी हमनें बातें कोई
गहरे समुन्दर में दोनों नहाते रहे
प्रिय! तुम्हारी- हमारी मधुयामिनी’
हम बिखरते रहे तुम तुमको पाते रहे
प्रेम की पवित्रता को दर्शाती तथा वर वधू के
हृदय की सुंदर छवि को कविता के माध्यम से व्यक्त करने की आपकी कला निराली है
धन्यवाद
बेहद सधे हुए सार्थक शब्दों के माध्यम से लिखा है आपने
धन्यवाद
बहुत खूब
धन्यवाद
बहुत ख़ूब
धन्यवाद