पर्यावरण के असंतुलन की
तस्वीर हर ओर दिखने लगी है
जिंदगी जीने की एक नई
परिभाषा चहुं ओर लिखने लगी है
विकट गर्मी का परिणाम दिख रहा है
सूख रहे तालाब पेड़ कट कट बिक रहा है
धरा की हरियाली से खिलवाड़ बंद करो
भविष्य का सुकून चाहिए तो अब वार बंद करो
पक्षियों का झुंड भी उड़ चला है
अब तो हरियाली छांव की तलाश में
प्यासे पशु पक्षी, व्याकुल गरीब
मर रहा है अब तो पानी के प्यास में
कल के भविष्य को बचाना है अगर
जीवन और पर्यावरण का संतुलन बनाना होगा
सोचो कल अगर पेड़ न होंगे न होगा पानी
न होगा पक्षियों का ठौर न अपना ठिकाना होगा
आने वाले कल को क्या तुम
इतनी भयावह सौगात देकर जाओगे
आओ प्रण करें, पेड़ लगाएं जल बचाएं
नौनिहालों को फिर वही वातावरण दिए बिना
मर कर भी चैन नहीं पाओगे।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
पर्यावरण
Comments
8 responses to “पर्यावरण”
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पर्यावरण के संतुलन पर प्रश्न उठाती हुई और उसका हल सुझाती हुई
बहुत सुंदर रचना-

आपका आभार
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बहुत खूब
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आभार
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बहुत शानदार अभिव्यक्ति सर, वाह, शानदार लेखनी
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धन्यवाद पांडेय जी
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बहुत खूब
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बहुत खूब
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