बात ही कुछ और है

नदियों में गंगा की, ध्वज में तिरंगा की ,
बात ही कुछ और है फलों में आम की, देवताओं में श्याम की ,
बात ही कुछ और है शादी में कार्ट की, फेक्लटी में आर्ट की ,
बात ही कुछ और है जिन्दगी में नॉलेज की, पिलानी में राकेश कॉलेज की ,
बात ही कुछ और है अनाजों में बाजरे की, पहनावे में घाघरे की ,
बात ही कुछ और है पक्षियों में मोर की , रात के अंधेरे में चोर की,
बात ही कुछ और है पशुओं में गाय की, सरकारी नौकरी में ऊपरी आय की,
बात ही कुछ और है रत्नों में हीरे की, सलाद में खीरे की ,
बात ही कुछ और है जिन्दगी में सगाई की ,सर्दी में रजाई की ,
बात ही कुछ और है
“संदीप काला “

Comments

8 responses to “बात ही कुछ और है”

  1. बहुत सुंदर, भाव और शिल्प का उम्दा तालमेल

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      कविता की समीक्षा करने के लिए धन्यवाद सर जी

  2. Geeta kumari

    बहुत खूब,सुन्दर रचना

  3. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    Thank you very much

  4. अति उत्तम

    1. SANDEEP KALA BANGOTHARI

      Thank you very much

  5. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    Thank you very much Sir ji

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