चल रही आंधियां हैं
थपेड़े ठंड के हैं,
लिख रहा बेजुबानी
भाव कुछ मंद से हैं।
फिजाँ झकझोरने को
पास कुछ भी नहीं है
नैन सूखे हुए हैं
होंठ कुछ बन्द से हैं।
नहीं हो पाये अपने
रहे बेगाने वो भी
समझ लें भावना को
मित्र भी चंद से हैं।
चमकते सूर्य हैं वो
ठिठुरते इन दिनों के
और हम राह में उनकी
घिरे से धुंध से हैं।
चल रही आंधियां हैं
Comments
4 responses to “चल रही आंधियां हैं”
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वाह, अमीन
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वाह सुंदर वा बेहतरीन कल्पना
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बहुत ही सुंदर पंक्तियां
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अतिसुंदर रचना
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