जाने कितने अल्फाज ठिठुर गये
जो लिखे थे मन के कागज पर मैंने
सिकुड़ गये कुछ
ठण्ड की कटीली रातों में तो
कुछ जम गये बर्फ के गोलों में
सुबह धूप निकलेगी तो
पिघलेंगे यही सोंचती रही मैं
पर ऐसा कुछ भी ना हुआ
वह अल्फाज जाने किन
समुंदरों में बह गये
शायद घने कोहरे की धुंध में
भटक गये
तब से लिए ‘कलम और स्याही’ घूमती हूँ
पर वह अल्फाज
खो गये तो खो गये !!
अल्फाज ठिठुर गये
Comments
5 responses to “अल्फाज ठिठुर गये”
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होता है कभी-कभी ऐसा भी । खो जाते हैं अल्फाज
काबिले तारीफ रचना -

Very good
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अतिसुंदर भाव
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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