पिता के चरण छुए जो,
कभी गरीब नहीं होता
माता के चरण छुए जो
वो बदनसीब नहीं होता
अग्रज के चरण छुए तो
कभी गमगीन नहीं होता
गुरु के पैरों को छूकर
विद्या का वरदान मिले
विपत्ति सब पर आती है
कोई बिखर जाए
कोई निखर जाए
चलते रहना ही सफ़लता है
वरना तो हार है,
जियो तो ज़िन्दगी है
वरना सब बेकार है
____✍️गीता
सफ़लता
Comments
6 responses to “सफ़लता”
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अतिसुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏
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सुंदर सी शायरी को कविता में पिरोकर आपने और सुंदर बना दिया है
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बहुत-बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
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वाह, अति उत्तम रचना, बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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