ऊर्जा स्रोत

ऊर्जा स्रोत
————-
प्रिय!
विद्युत सी है वाणी.. चल पड़ती है तो कानों में घुल… रूपांतरित हो जाती है मेरी हंसी और क्रोध में अनायास।

याद दिला ही देते हो तुम “जूलियस रॉबर्ट मेयर”की…
ऊर्जा के कभी नष्ट ना हो पाने के नियम के साथ।

कभी-कभी बादलों सा हो जाता है हृदय… भरभरा कर फट पड़ता है,
चमकने लगती है कई तरह की बिजलियां… आंखों, चेहरे, जुबां और नाक की नथुनों से।

अबकी बार ऊर्जा का रूपांतरण कुछ डरा देता है तुमको…
और क्षय होने लगती है कुछ हिस्सा ऊर्जा दूसरे नियम के अनुसार।

आंखों से बहते जल की ऊर्जा…. जल शक्ति बन रोशन कर देती है यादों के गलियारों में लटके बल्ब।

आने लगती हैं अच्छी -बुरी यादें एक साथ।

यादें! जो बायोमास की तरह संचित है मन के किसी कोने में।
लग जाती हैं मस्तिष्क में उपजे विचारों की पौध रोपने में।
मंथन! दही सा मथने लगता है विचारों को…
मक्खन की तरह …
ऊर्जा फिर बाहर आने लगती है।

हां! ऊर्जा के इस स्थानांतरण में तापमान में फर्क आ जाता है।

आखिर! मनुजता भी तो विद्युत के तीक्ष्ण झटके खाकर ही परिपक्व हुई है।
तुम्हारी हंसी मिश्रित फूंक… फिर वायु ऊर्जा में बदल. ‌.. घुमाने लगती है पवन चक्की दिमाग की।

दिमाग! जब घूमते- घूमते घनचक्कर बन जाता है तो सूर्य के समान तुम! सौर ऊर्जा युक्त प्रेम से… दे देते हो प्राण….
विद्युत से जलते सूखते हृदय को,

मेरे ऊर्जा स्रोत बन।

निमिषा सिंघल

Comments

One response to “ऊर्जा स्रोत”

Leave a Reply

New Report

Close