पूस की ठंड में,
वह सिकुड़ता सिमटता सा जा रहा था
कोहरा भी उसकी ओर आ रहा था
सूर्य भी धरा से विदा लेकर,
अपने भवन जा रहा था
दिन ढलने लगा था,
तिमिर छलने लगा था
आग तापने की सोची उसने,
तभी झमाझम जल गिरने लगा था
फुटपाथ पर इतनी ठंड में,
कहां जाए वो बेचारा
ना कोई घर है उसका,
ना कोई है सहारा
बचने को आ गया,
एक छप्पर के नीचे
एक छोटी सी शॉल को
लपेटता ही जा रहा है,
तभी उसने देखा कि,
सामने से कोई आ रहा है
अधेड़ उम्र की एक महिला आ गई,
उसको एक स्वेटर थमा गई
आ गई उसकी जान में जान
एक पल को लगा उसे,
जैसे उसकी मां आ गई।
_____✍️गीता
लगा जैसे मां आ गई
Comments
5 responses to “लगा जैसे मां आ गई”
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बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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कवि गीता जी की यह कविता यथार्थ से आदर्श की ओर जाती बहुत सुंदर कविता है। कवि का बिम्ब विधान बहुत ही सुन्दर है, कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीक़े से पेश किया गया है। दीन-हीन की दशा का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया गया है। सृजनात्मकता एवं गहन अनुभूति का चरमोत्कर्ष दिखाई दे रहा है।
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कविता की इतनी उत्कृष्ट और प्रेरणा देने वाली समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी। आपकी समीक्षा से बहुत उत्साह वर्धन मिलता है सर, बहुत आभार
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बहुत सुंदर
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