रात तू अकेली नहीं

दूर तलक तनहाई का आलम
अकेली बिरह वेदना सहती
ख़ामोशी की गहरी चादर ओढ़े
चुपचाप रहती है रात।
किसको अपनी पीङ सुनाए
कैसे उसको अपना मीत बनाए
जिसके लिए कयी ख्वाब सजाए
उधेड़-बुन में रोती रात।
देखो ये कोयल क्यूं ‌ कूके
तुझसे भी क्या प्रीतम रूठे
तू भी है विरहा ‌की मारी
खुद से ही बातें करती रात।

Comments

3 responses to “रात तू अकेली नहीं”

  1. Geeta kumari

    विरहणी की व्यथा प्रस्तुत करती हुई श्रृंगार पक्ष के वियोग पक्ष का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि सुमन जी की सुंदर रचना

  2. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    अंत भला‌ तो सब भला
    बहुत सुंदर लाजबाव

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